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बर्थ एनिवर्सरी: शरीर थका… लेकिन दिमाग नहीं रुका, जानिए दुनिया को ब्रह्मांड समझाने वाले वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग की कहानी

स्टीफन हॉकिंग ने अपने शारीरिक कमजोरियों के बावजूद अदम्य हौसले और तेज दिमाग से ब्रह्मांड के रहस्यों को समझा और विज्ञान की दुनिया में अमर योगदान दिया

न्यूज डेस्क, 8 जनवरी 2026:

जब 21 साल की उम्र में डॉक्टरों ने कहा कि अब तुम्हारे जीने के केवल पांच साल बचे हैं, तो बहुत से लोग हार मान लेते। लेकिन स्टीफन हॉकिंग ने हार को चुनौती दे दी। अपनी बीमारी को मात देकर वे दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में शामिल हुए और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का साहसिक काम किया। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में सैद्धांतिक ब्रह्मांड विज्ञान के निदेशक बने हॉकिंग ने साबित कर दिया कि इंसान का दिमाग और हौसला, शरीर की कमजोरी से कहीं आगे होता है।

स्टीफन हॉकिंग का जन्म और प्रारंभिक जीवन

8 जनवरी 1942 को इंग्लैंड में जन्में स्टीफन विलियम हॉकिंग बचपन से ही विज्ञान में रुचि रखते थे। उन्होंने सामान्य जीवन की तरह पढ़ाई की, लेकिन 21 साल की उम्र में उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उस समय उन्हें ALS नाम की गंभीर बीमारी हो गई, जिसमें शरीर की मांसपेशियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं।

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डॉक्टरों की भविष्यवाणी और हिम्मत

डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें पांच साल से ज्यादा जीवित रहने की संभावना नहीं है। लेकिन स्टीफन हॉकिंग ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और 1965 में ब्रह्मांड विज्ञान में पीएचडी पूरी की। उनके दिमाग ने कभी थकावट नहीं मानी।

वैज्ञानिक उपलब्धियां और ब्लैक होल थ्योरी

1974 में हॉकिंग ने ब्लैक होल थ्योरी पेश की, जिसने विज्ञान की सोच बदल दी। सिर्फ 32 साल की उम्र में वे रॉयल सोसाइटी के सबसे युवा सदस्य बने। बाद में उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में वही पद संभाला, जहां कभी अल्बर्ट आइंस्टीन पढ़ाते थे।

साहित्यिक योगदान: A Brief History of Time

1988 में हॉकिंग की किताब A Brief History of Time प्रकाशित हुई। यह किताब विज्ञान की सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों में शामिल हुई। इस किताब ने आम लोगों के लिए ब्रह्मांड की जटिलताओं को सरल भाषा में समझाना आसान बनाया।

जीवन और दर्शन

स्टीफन हॉकिंग का मानना था कि काबिलियत शरीर की मोहताज नहीं होती। वे हमेशा कहते थे कि शारीरिक अक्षमताओं के चलते ही उन्हें ब्रह्मांड पर गहराई से सोचने का मौका मिला। उन्होंने साबित किया कि दुनिया में कोई अपंग नहीं होता। उनका कहना था कि दिमाग एक कंप्यूटर की तरह है, और हर हिस्से की क्षति के बावजूद वह काम कर सकता है।

अदम्य साहस और निधन

अपने लगभग 76 साल के जीवन में स्टीफन हॉकिंग 53 साल तक व्हीलचेयर पर रहे। उन्होंने अपनी बीमारी को कभी अपनी सफलता की राह में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने जिंदगी को हौसले और मेहनत से जीया। 14 मार्च 2018 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका योगदान और प्रेरणा आज भी विज्ञान और मानवता के लिए मिसाल है।

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