यूपी की राजनीति में साल 2025 कई मायनों में उतार-चढ़ाव से भरा रहा लेकिन इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और उसकी मुखिया मायावती फिर से सुर्खियों में लौटती दिखाई दीं। पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक प्रभाव में लगातार गिरावट, चुनावों में हार और संगठन की टूट-फूट के बाद यह माना जाने लगा था कि बसपा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। प्रदेश की विधानसभा में महज एक विधायक के सहारे किसी भी प्रकार की निर्णायक राजनीति की संभावना कम दिखाई देती थी। इस बीच 2025 में मायावती ने अपने अंदाज में वापसी का प्रयास किया और इस बार उनका फोकस सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं बल्कि संगठनात्मक पुनर्निर्माण, नए नेतृत्व को आगे बढ़ाना और सामाजिक समीकरणों की नई व्याख्या पर केंद्रित था।
लखनऊ की रैली : मौन रणनीति से आक्रामक राजनीति तक
लखनऊ में हुई विशाल जनसभा ने इस बात के संकेत साफ दिए कि मायावती अब अपने परंपरागत मौन और सीमित सार्वजनिक गतिविधियों वाले राजनीति मॉडल से बाहर निकलकर सक्रिय मैदान की ओर लौट रही हैं। इस रैली में जुटी भीड़ और मंच से दिए गए संदेशों ने विपक्षी दलों के लिए एक चेतावनी का काम किया। लंबे समय तक राजनीतिक दूरी बनाए रखने के बाद मायावती का आक्रामक अंदाज देखने को मिला। इसमें उन्होंने सपा, कांग्रेस और भाजपा तीनों पर जमकर निशाना साधा।
उनकी राजनीति के केंद्र में दलित अस्मिता, सामाजिक न्याय और अंबेडकर के सिद्धांतों की पुनर्स्थापना का दावा प्रमुखता से उभरता दिखा। मायावती ने कहा कि यह लड़ाई सिर्फ चुनावी जीत की नहीं बल्कि समाज के उस वर्ग की आवाज को वापस मजबूत करने की है जिसकी उम्मीदें और भरोसा टूट रहे हैं।

आकाश आनंद का उभार : नई पीढ़ी की राजनीति या प्रयोग?
2025 में बसपा की रणनीति का सबसे बड़ा बदलाव आकाश आनंद का उदय रहा। मायावती अपने भतीजे और युवा नेता आकाश आनंद को पार्टी की नई ताकत के रूप में सामने लाईं। उन्हें संगठन में प्रमुख जिम्मेदारियां दी गईं। बिहार चुनाव की कमान सौंपी गई और यूपी में युवाओं से संवाद की जिम्मेदारी भी उन पर डाली गई।
हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में सफलता नहीं मिली लेकिन बसपा ने इसे नाकामी नहीं बल्कि सीख बताया।
समीक्षात्मक दृष्टि से देखें तो यह प्रयोग जोखिम भरा था। एक ओर पार्टी की कमजोर होती स्थिति और दूसरी ओर अनुभवहीन नेतृत्व के हाथों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जरूरी था क्योंकि बसपा के पारंपरिक वोटरों और संगठन में उम्रदराज नेतृत्व के साथ क्षमता और ऊर्जा की समस्या उठने लगी थी। आकाश आनंद का उभरना बसपा की उस कोशिश को दर्शाता है जिसमें वह भारतीय राजनीति की नई पीढ़ी की भाषा, सोशल मीडिया रणनीति और युवा वर्ग की अपेक्षाओं के अनुरूप खुद को ढालने का प्रयास कर रही है।

सोशल इंजीनियरिंग और भाईचारा कमेटियां : पुरानी रणनीति का नया संस्करण
बसपा ने 2007 में बहुमत हासिल किया था तो उसकी जीत की रीढ़ बनी थी सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति। अर्थात दलितों के साथ अन्य पिछड़ा वर्ग और सवर्ण समूहों का समीकरण। 2025 में मायावती इसी समीकरण की ओर लौटती दिखाई दीं लेकिन इस बार कुछ नए संदर्भों के साथ। राजनैतिक माहौल बदल चुका है। जातिगत समीकरणों के साथ पहचान की राजनीति का नया चक्र सामने है। इसी संदर्भ में बसपा ने भाईचारा कमेटियों को सक्रिय किया। इन कमेटियों का लक्ष्य दलित-मुस्लिम एकता के साथ-साथ व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाना है। चुनावी समीकरणों की नजर से देखें तो यह कदम मायावती का महत्वपूर्ण राजनीतिक निवेश है।
समीक्षात्मक रूप से कहा जाए तो यह रणनीति तभी सफल हो सकती है जब बसपा के पास बूथ स्तर पर मजबूत और सक्रिय संगठन हो। यही वह क्षेत्र है जहां बसपा पिछड़े वर्षों में लगातार कमजोर हुई है। इसलिए मायावती का संगठनात्मक फेरबदल और नई जिम्मेदारियों का वितरण एक सुविचारित कदम प्रतीत होता है।

विपक्ष पर आक्रामक रुख : राजनीतिक प्रासंगिकता की पुनर्स्थापना की कोशिश
साल 2025 में मायावती ने पहले के मुकाबले कहीं अधिक तीखे तेवर दिखाए। उन्होंने सपा और कांग्रेस पर कई मुद्दों को लेकर तीखा हमला बोला। चाहे कानून-व्यवस्था का सवाल हो, दलितों पर हमले, अंबेडकर प्रतिमाओं का अपमान या प्रदेश और केंद्र सरकार की कथित उदासीनता। इसका एक स्पष्ट उद्देश्य था। यह संदेश देना कि बसपा अभी भी दलितों की राजनीतिक आवाज का दावा करती है और उसे किसी भी दल के सहारे की आवश्यकता नहीं है।
मायावती ने 2027 के यूपी विधानसभा के चुनाव के मद्देनजर गठबंधन की अटकलों को फिलहाल स्पष्ट रूप से खारिज किया है। मतलब बसपा अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में लगी है। वैसे राजनीतिक समीकरणों के अनुसार गठबंधन की आवश्यकता महसूस हो सकती है लेकिन मायावती ने साफ संकेत दिया कि राजनीतिक पुनर्स्थापना का रास्ता समझौते से नहीं संघर्ष से निकलेगा।

बिहार विधानसभा चुनाव : सीख या पराजय?
बिहार विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन खराब रहा लेकिन मायावती ने इसे हार नहीं बल्कि अनुभव की संज्ञा दी। उन्होंने यहां भी आकाश आनंद को आगे रखा जिससे साफ है कि नेतृत्व परिवर्तन और नई पीढ़ी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ विकल्प नहीं बल्कि रणनीति है।
समीक्षात्मक विश्लेषण यह कहता है कि बिहार की राजनीति में बसपा की पैठ कमजोर है। इसलिए बिना गठबंधन और मजबूत जमीनी नेटवर्क के सफलता की उम्मीद करना अवास्तविक है लेकिन इसे मायावती 2027 के पहले एक अभ्यास भूमि के रूप में प्रयोग कर रही हैं। यह तर्क भी कमजोर नहीं है।

राजनीतिक ताकत बनाम मनोवैज्ञानिक प्रभाव
वर्ष 2025 में बसपा की राजनीतिक स्थिति मजबूत नहीं दिखाई दी। विधानसभा में महज एक विधायक के सहारे कोई बड़ा दावा मुश्किल है। हालांकि मायावती की तैयारी, सक्रियता और रणनीति ने विपक्षी दलों में बेचैनी बढ़ाई है।
सपा, भाजपा और कांग्रेस के लिए बसपा प्रत्यक्ष रूप से फिलहाल खतरा नहीं थी लेकिन यह भी सच है कि मायावती की मौजूदगी 2027 के लिए समीकरण बिगाड़ सकती है। यदि बसपा 3-7% अतिरिक्त वोट शेयर भी हासिल करती है तो यह कई सीटों पर परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकता है।

वापसी की राह लंबी, चुनौतियां बड़ी लेकिन प्रयास स्पष्ट
2025 में मायावती और बसपा की राजनीति को कम शब्दों में अस्तित्व की लड़ाई से आगे बढ़कर संघर्ष की नई भूमिका की शुरूआत कह सकते हैं। संगठन को खड़ा करना, युवाओं से जुड़ना, जातिगत समीकरणों को संतुलित करना और सबसे महत्वपूर्ण विश्वास बहाली है। वैसे 2025 के दौरान मायावती ने ये संदेश देने में सफलता पाई कि बसपा अभी खत्म नहीं हुई है बल्कि पुनर्जीवन के सफर में है।
अब देखना होगा कि 2026 और 2027 इस सफर को किस मोड़ पर ले जाते हैं। इतना साफ है कि 2025 में मायावती ने अपनी राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। यह परिभाषा यूपी की राजनीति में नई हलचल की पृष्ठभूमि तैयार कर रही है।







