
राजकिशोर तिवारी
देहरादून, 7 सितंबर 2026ः
उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी सोमवार को वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में हिमालय दिवस के अवसर पर आयोजित ‘हिमालयो नाम नगाधिराजः’ कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने कहा कि हिमालय केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान, संस्कृति, पर्यावरण और अस्तित्व का आधार है। बदलते जलवायु संकट के बीच हिमालयी क्षेत्रों में विकास की जरूरत और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। उत्तराखंड के विकास का रास्ता इकोलॉजी और इकोनॉमी के संतुलन से होकर ही निकलेगा।
मुख्यमंत्री ने हिमालय परिषद में मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के विस्तार के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा की। साथ ही हिमालय के संरक्षण, संवर्धन और सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और हिमालयी क्षेत्रों के लिए समर्पित विशिष्ट व्यक्तित्वों को हर वर्ष हिमालय दिवस के अवसर पर ‘हिमालय विभूति सम्मान’ दिए जाने की घोषणा की। धामी ने कहा कि हिमालय से गंगा और यमुना समेत अनेक जीवनदायिनी नदियों का उद्गम होता है। जलवायु परिवर्तन व ग्लोबल वार्मिंग का असर अब हिमालयी क्षेत्रों में साफ दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों पर बढ़ता दबाव, पारंपरिक जलस्रोतों का संकट, अतिवृष्टि, भूस्खलन, वनाग्नि और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाएं नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। ऐसे में विकास कार्यों में विज्ञान, तकनीक, सुरक्षा और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी है। सीएम ने कहा कि पर्वतीय राज्य के विकास का मॉडल उसकी भौगोलिक परिस्थितियों और धारण क्षमता के अनुरूप होना चाहिए। ऐसा विकास जरूरी है, जिसमें सड़कें भी बनें और जंगल भी बचें। रोजगार बढ़े और नदियां निर्मल रहें व पर्यटन का विस्तार हो, लेकिन पहाड़ों की धारण क्षमता प्रभावित न हो।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकारों की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की है। पानी-बिजली की बचत, प्लास्टिक का कम इस्तेमाल, स्वच्छता, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और प्रकृति के प्रति जिम्मेदार व्यवहार जैसे प्रयास सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं। धामी ने कहा कि नमामि गंगे, नेशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग द हिमालयन इकोसिस्टम और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम जैसे प्रयासों से हिमालयी क्षेत्रों के संरक्षण और विकास को गति मिल रही है। उत्तराखंड का प्रयास है कि वह हिमालय संरक्षण को लेकर केवल चिंता व्यक्त करने वाला राज्य न रहे, बल्कि देश को दिशा देने वाला मॉडल हिमालयी राज्य बने।
उन्होंने कहा कि हिमालय संरक्षण को पहाड़ की समृद्धि से जोड़ना होगा। स्थानीय उत्पादों को बाजार, गांवों में रोजगार, मातृशक्ति का आर्थिक सशक्तिकरण, प्राकृतिक खेती और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देकर पलायन की चुनौती से निपटा जा सकता है। जंगल, बुग्याल, नदियां, जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान उत्तराखंड की इकोलॉजिकल वेल्थ हैं, जिन्हें भविष्य की आर्थिक ताकत में बदला जा सकता है। सीएम ने बताया कि दो सितंबर के बुग्याल दिवस से नौ सितंबर के हिमालय दिवस तक पूरे सप्ताह को ‘हिमालय दिवस सप्ताह’ के रूप में मनाने की शुरुआत की गई है।

धामी ने हिमालय संरक्षण को सरकारी आयोजनों तक सीमित रखने के बजाय इसे जनभागीदारी का आंदोलन बनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम में विधायक किशोर उपाध्याय, हेस्को के संस्थापक एवं पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. तृप्ता ठाकुर और यू-कॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़े पांच पोस्टरों और ‘विज्ञान संप्रेषण’ पत्रिका के पांचवें वार्षिकांक का भी विमोचन किया।






