लखनऊ, 21 नवंबर 2025 :
आंखों में पड़ने वाली एक पतली-सी रोशनी… पर ताकत इतनी कि इंसान को पल भर में अंधा कर दे और आसमान में उड़ता प्लेन भी खतरे में डाल दे। क्लासरूम और प्रेजेंटेशन में इस्तेमाल होने वाला छोटा-सा पेन आज कई देशों में डर की वजह बन चुका है। लेजर पॉइंटर, जिसकी चमक पहले सीखने में मदद करती थी, अब हवाई सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई है।
कैसे शुरू हुई लेजर पॉइंटर की कहानी?
लेजर पॉइंटर का सफर 1960 से शुरू होता है, जब वैज्ञानिक थियोडोर मेमन ने पहला रूबी लेजर बनाया। यह बड़ा और बेहद महंगा था। 1980 के दशक में सस्ते लेजर डायोड आए और 1990 की शुरुआत तक अमेरिका और जापान में छोटे लेजर पॉइंटर बनकर बाजार में आ गए। पहले ये महंगे थे, लेकिन 1995 से 2000 के बीच चीन ने इन्हें बहुत सस्ता बना दिया और देखते ही देखते 5 से 10 डॉलर में मिलने लगा।
कब बना यह डिवाइस खतरनाक?
पहले यह क्लासरूम और मीटिंग में काम आता था। लेकिन इसकी रोशनी बहुत तेज और एक जगह केंद्रित होती है। 5 मिलीवाट से ज्यादा पावर वाला लेजर इंसान की आंख को तुरंत नुकसान पहुंचा सकता है। गलत इस्तेमाल बढ़ने लगा और सबसे बड़ा खतरा तब सामने आया जब लोग उड़ते हुए प्लेन पर लेजर मारने लगे। अगर पायलट की आंख में यह रोशनी लग जाए तो वह कुछ सेकंड के लिए कुछ नहीं देख पाता, जिससे प्लेन कंट्रोल से बाहर जा सकता है और क्रैश का खतरा बन जाता है।
कई देशों ने लगाया बैन
दुनिया के कई देशों ने इसके खतरे को देखते हुए कड़े नियम बना दिए हैं।अमेरिका में 5 मिलीवाट से ज्यादा पावर वाले लेजर पॉइंटर बेचना गैरकानूनी है। ब्रिटेन में 1 मिलीवाट से ज्यादा पावर वाला लेजर तक बैन है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में बिना वजह पब्लिक प्लेस में लेजर रखना या चलाना जुर्म है और भारी जुर्माना या जेल हो सकती है।
भारत में क्या है नियम?
भारत में लेजर पॉइंटर पर देशभर में कोई बड़ा बैन नहीं है, लेकिन एयरपोर्ट के आसपास 10 से 20 किलोमीटर तक लेजर चलाना अपराध माना जाता है। पुलिस कई मामलों में कार्रवाई कर चुकी है और कोर्ट ने भी इसे गंभीर जोखिम माना है।
इस तरह एक छोटा-सा डिवाइस, जो मदद के लिए बनाया गया था, आज गलत इस्तेमाल की वजह से दुनिया की हवाई सुरक्षा के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है।






