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जन्मदिन विशेष: जब हलवा-छोले और हौसलों के साथ अंतरिक्ष तक पहुंचा एक भारतीय, जानिए एस्ट्रोनॉट राकेश शर्मा की दिलचस्प कहानी

मिग-21 उड़ाने वाले राकेश शर्मा ने रूसी मिशन के साथ अंतरिक्ष तक पहुंचकर भारत का नाम सितारों तक पहुंचाया और इतिहास रच दिया। कड़ी ट्रेनिंग, रूसी भाषा और अटूट हौसले के दम पर राकेश शर्मा ने भारत को उसका पहला एस्ट्रोनॉट दिया

न्यूज डेस्क, 13 जनवरी 2026:

मिग-21 के कॉकपिट से निकलकर जब एक भारतीय ने अंतरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों को छुआ, तो वह सिर्फ एक उड़ान नहीं थी, बल्कि देश के सपनों की छलांग थी। हाथ में अनुशासन, मन में हौसला और साथ में हलवा-छोले लेकर राकेश शर्मा ने साबित कर दिया कि भारत का साहस धरती तक सीमित नहीं है। यही वह कहानी है, जहां एयरफोर्स का एक जांबाज पायलट बना भारत का पहला अंतरिक्ष यात्री।

एयरफोर्स से अंतरिक्ष तक का सफर

भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा का सफर किसी सपने से कम नहीं रहा। वह एस्ट्रोनॉट बनने के इरादे से नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना के एक पायलट के रूप में आगे बढ़े थे। महज 22 साल की उम्र में उन्होंने पाकिस्तान के साथ हुई जंग के दौरान मिग-21 विमान से 21 बार उड़ान भरी थी। 25 साल की उम्र तक वह भारतीय वायुसेना के सबसे बेहतरीन पायलटों में गिने जाने लगे थे।

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पटियाला से वायुसेना तक

राकेश शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था। उन्होंने 1966 में नेशनल डिफेंस एकेडमी के माध्यम से भारतीय वायुसेना जॉइन की। महज 21 साल की उम्र में वह वायुसेना का हिस्सा बन गए और अपनी काबिलियत से तेजी से आगे बढ़ते चले गए।

रूस के साथ भारत का अंतरिक्ष सपना

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए सोवियत संघ की मदद ले रही थीं। साल 1982 में यह तय हुआ कि रूस के एक अंतरिक्ष मिशन के साथ एक भारतीय को भी अंतरिक्ष भेजा जाएगा। उस समय राकेश शर्मा वायुसेना में स्क्वाड्रन लीडर बन चुके थे।

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कड़ा चयन और रूसी भाषा की चुनौती

इस मिशन के लिए करीब 50 पायलटों ने परीक्षा दी, जिसमें से राकेश शर्मा और रवीश मल्होत्रा को चुना गया। दोनों को प्रशिक्षण के लिए रूस भेजा गया। वहां ट्रेनिंग ज्यादातर रूसी भाषा में होनी थी, इसलिए दोनों को रोज 6 से 7 घंटे रूसी भाषा सीखनी पड़ी। करीब तीन महीने में दोनों रूसी भाषा समझने और बोलने लगे। प्रशिक्षण के दौरान ही राकेश शर्मा को मुख्य मिशन के लिए चुन लिया गया और रवीश मल्होत्रा को बैकअप रखा गया।

3 अप्रैल 1984: ऐतिहासिक उड़ान

अंतरिक्ष यात्रा से करीब एक साल पहले दोनों रूस की स्टार सिटी पहुंचे, जहां अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण केंद्र है। यहां उनके खानपान, ताकत और सहनशक्ति पर लगातार नजर रखी गई। आखिरकार 3 अप्रैल 1984 को राकेश शर्मा ने रूसी अंतरिक्ष यान सोयूज टी-11 से अंतरिक्ष की ओर उड़ान भरी और इतिहास रच दिया।

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अंतरिक्ष में भी रहा भारत का स्वाद

राकेश शर्मा अपने साथ अंतरिक्ष में सूजी का हलवा, पुलाव और आलू-छोले लेकर गए थे, जिन्हें मैसूर की डिफेंस रिसर्च लैब ने खास तौर पर तैयार किया था। वह इंदिरा गांधी, राष्ट्रपति जैल सिंह और रक्षा मंत्री वेंकटरमन की तस्वीरें और राजघाट की मिट्टी भी साथ ले गए। अंतरिक्ष से उन्होंने इंदिरा गांधी से बातचीत की, जहां भारत के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा था, “सारे जहां से अच्छा”। अंतरिक्ष में रहते हुए वह योग के जरिए स्पेस सिकनेस से भी बचे।

सम्मान और सादगी भरी वापसी

राकेश शर्मा को सोवियत संघ की ओर से हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन सम्मान दिया गया। भारत में उन्हें और उनके साथियों को अशोक चक्र से नवाजा गया। अंतरिक्ष से लौटने के बाद राकेश शर्मा फिर से वायुसेना में पायलट के रूप में अपनी सेवाएं देते रहे।

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