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LPG संकट के बीच ‘एथेनॉल स्टोव’ पर सरकार का फोकस…विकल्प के तौर पर तैयारी तेज

एलपीजी इक्विपमेंट रिसर्च सेंटर के साथ देश की कई आईआईटी इस स्टोव के डिजाइन को अंतिम रूप देने में जुटी

न्यूज डेस्क, 28 मार्च 2026:

रसोई गैस की किल्लत के बीच सरकार एलपीजी का विकल्प तलाशने में जुटी है। इन हालातों में सरकार भविष्य को लेकर सतर्क हो गई है। इसी मकसद से एथेनॉल से चलने वाले स्टोव को बढ़ावा देने की योजना पर काम तेज हुआ है। खास बात ये है कि यूपी में इसका सर्वाधिक उत्पादन होता है अन्य राज्यों में इसका पायलट प्रोजेक्ट भी चल रहा है। ऐसे में एथेनॉल स्टोव लाने पर जल्द ठोस फैसला हो सकता है।

बता दें कि वैश्विक तनाव के बीच देश में एलपीजी की सप्लाई को लेकर पिछले कुछ दिनों से हालात ठीक नहीं हैं। खासकर यूपी के कई जिलों में लोगों को रसोई गैस के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। इस स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार अब एलपीजी पर निर्भरता कम करने के विकल्प तलाश रही है। इसी कड़ी में एथेनॉल स्टोव को लेकर तैयारी शुरू कर दी गई है। एलपीजी इक्विपमेंट रिसर्च सेंटर के साथ देश की कई आईआईटी इस स्टोव के डिजाइन को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। 24 मार्च को दिल्ली में केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने बताया था कि इस दिशा में तेजी से काम चल रहा है।

देश मे सर्वाधिक उत्पादन है यूपी में

अच्छी बात ये है कि देश में एथेनॉल उत्पादन में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। यहां बड़ी संख्या में प्लांट चल रहे हैं और कई जिले उत्पादन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। गोरखपुर में निजी क्षेत्र का बड़ा प्लांट भी स्थापित है। सरकार एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए भी कदम उठा रही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में टूटे चावल की मात्रा घटाने का प्रस्ताव है, जिससे एथेनॉल बनाने के लिए ज्यादा कच्चा माल उपलब्ध हो सके। इस पर जल्द फैसला लिया जा सकता है।

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कई फसलों से तैयार होता है एथेनॉल, खास तरीका है स्टोव जलाने का

एथेनॉल स्टोव ऐसा चूल्हा है जो केरोसिन की जगह एथेनॉल पर चलता है। एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल आधारित ईंधन है, जिसे गन्ना, मक्का, गेहूं, चावल जैसी फसलों से तैयार किया जाता है। साधारण केरोसिन स्टोव में पहले बर्नर को जलाने के लिए नीचे स्पिरिट या तेल डालना पड़ता है और फिर पंप से दबाव बनाकर उसे चलाया जाता है। वहीं एथेनॉल स्टोव में बर्नर के नीचे खास तरह का फाइबर लगा होता है जो ईंधन को सोख लेता है। इसमें सीधे एथेनॉल डालकर जलाया जाता है और फाइबर खुद नहीं जलता, बल्कि ईंधन धीरे-धीरे जलता रहता है।

तेज आंच के साथ स्वास्थ्य के लिए भी कम नुकसानदेह

एथेनॉल स्टोव की आंच तेज होती है, जिससे खाना जल्दी पकता है। इससे धुआं और कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है, जो सेहत के लिहाज से बेहतर माना जाता है। जानकारी के मुताबिक एक लीटर एथेनॉल में कुछ मॉडल लंबे समय तक जल सकते हैं, जबकि केरोसिन स्टोव उतने समय तक नहीं चलते।

एलपीजी का विकल्प बनाने पर फोकस

फिलहाल एथेनॉल स्टोव को पूरी तरह एलपीजी का विकल्प नहीं माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह है एथेनॉल की सीमित उपलब्धता। अभी एथेनॉल का बड़ा हिस्सा पेट्रोल में मिलाने में इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में बड़े स्तर पर सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना चुनौती बना हुआ है।

बाजार में लाने की प्लानिंग में सरकार

सरकार की कोशिश है कि एथेनॉल स्टोव जल्द बाजार में उपलब्ध हो। इससे पहले कुछ राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत इनका इस्तेमाल कराया जा चुका है। असम और ओडिशा में इस तरह के प्रयोग हुए हैं, जबकि महाराष्ट्र में भी इस पर काम किया गया है। सरकार पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल एटीएम लगाने की योजना पर भी विचार कर रही है, ताकि ईंधन की उपलब्धता आसान हो सके।

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