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ट्रंप का टैरिफ वार : पेटेंट दवाओं पर 100% शुल्क, मेटल पर भी बदले नियम

रीशोरिंग को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका का बड़ा कदम, भारत पर सीमित असर लेकिन धातु निर्यातकों की चिंता बढ़ी

न्यूज डेस्क, 4 अप्रैल 2026:

ईरान से जारी युद्ध जैसे तनावपूर्ण वैश्विक माहौल के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर आक्रामक आर्थिक रणनीति अपनाते हुए टैरिफ नीतियों में बड़ा बदलाव किया है। नए आदेश के तहत अमेरिका ने कुछ खास ब्रांडेड (पेटेंट) दवाओं के आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य दवा कंपनियों को विदेशों से उत्पादन हटाकर अमेरिका में ही निर्माण करने के लिए मजबूर करना है।

यह नया टैरिफ उन देशों पर लागू होगा जिन्होंने अमेरिकी वाणिज्य विभाग के साथ रीशोरिंग (उत्पादन को वापस अमेरिका लाना) समझौता या मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) मूल्य निर्धारण समझौता नहीं किया है। इस नीति के तहत बड़ी कंपनियों के लिए यह टैरिफ 31 जुलाई से लागू होगा और छोटी कंपनियों को 29 सितंबर तक का समय दिया गया है।

हालांकि भारत के लिए यह झटका सीमित माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत मुख्य रूप से अमेरिका को जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है जिन्हें फिलहाल करीब एक साल के लिए इस टैरिफ से छूट दी गई है। इसके बावजूद भविष्य में इस छूट के खत्म होने की आशंका से भारतीय फार्मा कंपनियां सतर्क हो गई हैं।

दूसरी ओर अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के लिए अलग दरें तय की हैं। यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और स्विट्जरलैंड से आने वाली दवाओं पर 15% टैरिफ लगाया जाएगा। ब्रिटेन को राहत देते हुए उस पर 10% शुल्क निर्धारित किया गया है क्योंकि उसने रीशोरिंग और MFN समझौतों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

ट्रंप प्रशासन ने धातु (मेटल) आयात के नियमों में भी बदलाव किया है। नए प्रावधान के अनुसार यदि किसी उत्पाद में धातु की मात्रा कुल वजन के 15% से कम है, तो उस पर अलग से कोई धातु शुल्क नहीं लगेगा। दूसरी तरफ यदि यह मात्रा 15% से अधिक होती है तो पूरे उत्पाद मूल्य पर 25% का समान टैरिफ लागू होगा।

इस बदलाव का सीधा असर भारत के इस्पात, एल्युमीनियम और तांबा निर्यातकों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार में नई प्रतिस्पर्धा और तनाव को जन्म दे सकता है। खासकर ऐसे समय में जब विश्व पहले ही आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा है।

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