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‘दृश्यम 3’ रिव्यू : बिना बोले आंखों से डरा गये मोहनलाल… रोंगटे खड़े कर देगा क्लाइमेक्स

जीतू जोसफ का डायरेक्शन और अनिल जॉनसन का बैकग्राउंड म्यूजिक है फिल्म की रीढ़, जब लगेगा कहानी अब खत्म तभी आयेगा नया ट्विस्ट

एंटरटेनमेंट डेस्क, 22 मई 2026:

भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फ्रेंचाइजी की बात करे तो ‘दृश्यम’ को कौन नहीं जानता। इसी कड़ी में अब इसका तीसरा भाग ‘दृश्यम 3’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुका है। निर्देशक जीतू जोसेफ और मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल की जोड़ी ने एक बार फिर दर्शकों को कुर्सी से बांधे रखने की कोशिश की है। आइए जानते हैं कि क्या जॉर्जकुट्टी इस बार भी अपने परिवार को कानून के शिकंजे से बचा पाया या इस बार भी पासा पलट गया।

पुरानी कहानी का नया खौफ है ‘दृश्यम 3’

फिल्म की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां पिछला भाग खत्म हुआ था लेकिन इस बार जॉर्जकुट्टी (मोहनलाल) का रुतबा बदल चुका है। वो केवल एक केबल टीवी ऑपरेटर नहीं बल्कि 100 करोड़ की कमाई करने वाली फिल्म का प्रोड्यूसर बन चुका है। पैसा और शोहरत आने के बाद भी जॉर्जकुट्टी के परिवार का डर खत्म नहीं हुआ है। बड़ी बेटी अंजू आज भी मानसिक सदमे से उबर नहीं पाई है जिससे उसकी शादी में मुश्किलें आ रही हैं। दूसरी तरफ पुलिस आज भी उस दबे हुए राज को उगलवाने के लिए जॉर्जकुट्टी के पीछे साए की तरह पड़ी है। इस बार पुलिस का जाल और भी ज्यादा मजबूत है। कहानी इस बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि जॉर्जकुट्टी अपने परिवार को बचाने के लिए अब क्या करने वाला है?

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बेमिसाल अभिनय और सस्पेंस से भरपूर क्लाइमेक्स

जॉर्जकुट्टी के किरदार में मोहनलाल ने एक बार फिर जान फूंक दी है। एक बेबस, थके हुए लेकिन अपने परिवार के लिए किसी भी हद तक जाने वाले पिता के रूप में उनकी आंखें और चेहरे के हाव-भाव बिना बोले बहुत कुछ कह जाते हैं। जीतू जोसेफ जिन्हें सस्पेंस क्रिएट करने में महारथ है उन्होंने बखूबी इसे फिल्म में दर्शाया है। फिल्म का आखिरी आधा घंटा बेहद अप्रत्याशित है जब आपको लगेगा कि सब कुछ खत्म हो गया तब कहानी वहीं से एक नया मोड़ ले लेती है। दृश्यम 3 सिर्फ पुलिस और मुजरिम का खेल नहीं है बल्कि फिल्म में एक ऐसे परिवार का दर्द दिखाया गया है जो अपराध के भय के बोझ तले दबा हुआ है। यह इमोशनल एंगल दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखता है। फिल्म का एक मजबूत पक्ष अनिल जॉनसन का संगीत है जो फिल्म में रोमांच और थ्रिल बनाए रखता है। फिल्म की बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी सतीश कुरूप की है

कहां कमजोर पड़ी फिल्म?

फिल्म का पहला भाग काफी धीमा है। निर्देशक ने कहानी को स्थापित करने और किरदारों के मानसिक तनाव को दिखाने में जरूरत से ज्यादा वक्त लिया है जिससे शुरुआती 45 मिनट थोड़े उबाऊ लग सकते हैं। पहली दो फिल्मों की तुलना में इस बार शुरुआती हिस्से में चौंकाने वाले दृश्य कम हैं। दृश्यम 3 सस्पेंस सिनेमा के शौकीनों के लिए एक बेहतरीन तोहफा है। भले ही फिल्म की रफ्तार शुरुआत में धीमी हो लेकिन फिल्म की जान सेकंड हांफ में रोंगटे खड़े कर देने वाला क्लाइमेक्स है अगर आप भी बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर देखने के शौकीन हैं तो दृश्यम 3 आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है।

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