लखनऊ, 13 अप्रैल 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में आयोजित समता अधिकार सम्मेलन में बहुजन समाज के बुद्धिजीवियों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, युवाओं और छात्रों का जुटान हुआ। सम्मेलन में सामाजिक न्याय के व्यापक एजेंडे पर संघर्ष को तेज करने की रणनीति तय की गई। इस दौरान दो पत्रिकाओं का विमोचन भी किया गया।
सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि वर्तमान दौर में बहुजन समाज की नई पीढ़ी सबसे बड़े हमले का सामना कर रही है। उन्होंने यूजीसी गाइडलाइंस का जिक्र करते हुए कहा कि कैंपसों में बढ़ते भेदभाव के खिलाफ बने कानूनों का विरोध दरअसल संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने आरोप लगाया कि सामाजिक न्याय की चेतना के विस्तार के साथ ही मनुवादी ताकतें सांप्रदायिकता के जरिए इसे कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं जबकि निजीकरण को वर्चस्व कायम रखने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

जेएनयू छात्रसंघ के सहसचिव एवं आइसा नेता दानिश ने कहा कि जातिगत भेदभाव अपने चरम पर है। यह एक सामाजिक बीमारी बन चुका है। उन्होंने रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि जब तक भेदभाव खत्म नहीं होगा ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।
बिहार से आए सामाजिक न्याय आंदोलन के संयोजक रिंकू यादव ने कहा कि हिंदी पट्टी में नौजवानों ने सामाजिक न्याय का झंडा बुलंद किया है। उन्होंने अतिपिछड़ी जातियों के सवालों को केंद्र में लाने और जातीय जनगणना के साथ आबादी के अनुपात में भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत बताई।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. राजेंद्र वर्मा ने समानता आधारित समाज की वकालत की। वहीं रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शोएब ने भेदभाव और सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष तेज करने की अपील की। कार्यक्रम के अंत में आरवाईए के प्रदेश सचिव सुनील मौर्य ने 11 सूत्रीय प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इसमें यूजीसी बिल लागू करने, जातीय जनगणना, महिला आरक्षण में ओबीसी कोटा, निजी क्षेत्र में आरक्षण और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसे मुद्दे शामिल रहे। सभी प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किए गए। सम्मेलन का संचालन राजीव यादव ने किया।






