लखनऊ, 11 जनवरी 2026:
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का चेहरा तेजी से बदल रहा है। योगी सरकार अब एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की मदद से इलाज को ज्यादा बेहतर, सुलभ और वक्त पर पहुंचाने की दिशा में काम कर रही है। करीब 24 करोड़ की आबादी, बड़े ग्रामीण इलाके और गंभीर बीमारियों की चुनौतियों के बीच तकनीक को स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा बनाया जा रहा है।
तकनीक के जरिये बेहतर इलाज का मकसद
सरकार का मकसद साफ है कि तकनीक के जरिए आम लोगों को बेहतर इलाज मिले, डॉक्टरों का काम आसान हो और फैसले तेजी से लिए जा सकें। इसी सोच के साथ एआई को स्वास्थ्य सेवाओं में एक मजबूत सहायक के रूप में अपनाया जा रहा है। अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अमित घोष के मुताबिक, पिछले करीब नौ साल में प्रदेश का स्वास्थ्य ढांचा मजबूत हुआ है और डिजिटल प्लेटफॉर्म को भी प्राथमिकता दी गई है। आज यूपी उन राज्यों में शामिल है जहां एआई आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को जमीन पर उतारने की सबसे ज्यादा क्षमता है।
फ्रंटलाइन वर्कर का काम आसान हुआ
प्रदेश में करीब 10 लाख फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर, आशा, एएनएम, नर्स और डॉक्टर गांव से लेकर शहर तक सेवाएं दे रहे हैं। इनके काम को आसान बनाने के लिए एचएमआईएस, आरसीएच पोर्टल, निक्षय पोर्टल और ई-संजीवनी जैसे डिजिटल सिस्टम पहले से सक्रिय हैं। अब इन्हीं प्लेटफॉर्म पर एआई आधारित समाधान जोड़े जा रहे हैं।
सर्वाधिक टेली कंसल्टेशन देने वाला राज्य बना यूपी
यूपी देश में सबसे ज्यादा टेली कंसल्टेशन देने वाला राज्य बन चुका है। ई-संजीवनी के जरिए लाखों लोग घर बैठे डॉक्टर से सलाह ले रहे हैं। अब इसमें एआई आधारित क्लिनिकल सपोर्ट सिस्टम भी जोड़ा गया है, जो मरीज के लक्षण और रिकॉर्ड देखकर इलाज के बेहतर विकल्प सुझाता है। इससे डॉक्टरों पर बोझ भी कम हो रहा है और मरीजों को सही इलाज मिल रहा है। सरकार का मानना है कि एआई डॉक्टर की जगह नहीं ले सकता, लेकिन उसे और मजबूत जरूर बना सकता है। इसी सोच के साथ तकनीक को सहायक औजार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
गंभीर बीमारियों पर रहेगी संजीदा नजर
टीबी जैसी गंभीर बीमारी पर भी एआई की मदद से नजर रखी जा रही है। निक्षय पोर्टल के साथ जुड़े एआई टूल्स उन इलाकों की पहचान कर रहे हैं जहां टीबी का खतरा ज्यादा है। इससे पहले ही सतर्कता बरती जा रही है और संसाधन वहां भेजे जा रहे हैं, जहां जरूरत है। मातृ और शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए भी एआई मददगार साबित हो रहा है। हाई रिस्क गर्भावस्था की पहचान, समय पर रेफरल और नवजात देखभाल में तकनीक से मदद मिल रही है। फ्रंटलाइन वर्कर को मोबाइल पर साफ संकेत मिलते हैं, जिससे वे सही वक्त पर कदम उठा पाते हैं। डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही हैं। एआई के जरिए सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग की जा रही है। आंखों से जुड़ी डायबिटिक रेटिनोपैथी की पहचान के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं, जिससे समय रहते इलाज संभव हो सके।
अनुभव को ध्यान में रखकर तैयार की गई तकनीक
प्रदेश में अपनाया गया एआई मॉडल पूरी तरह इंसान केंद्रित है। इसमें डॉक्टरों, नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों के अनुभव को ध्यान में रखकर तकनीक तैयार की जा रही है। यही वजह है कि इसे आसानी से अपनाया जा रहा है। शोध संस्थान, टेक कंपनियां और डोनर एजेंसियां मिलकर नए प्रयोग कर रही हैं। इससे नवाचार को रफ्तार मिल रही है। सरकार का लक्ष्य है कि उत्तर प्रदेश को एआई के क्षेत्र में मॉडल स्टेट बनाया जाए, ताकि बाकी राज्य भी इससे सीख सकें। स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीक की यह नई तस्वीर आम लोगों के लिए राहत लेकर आ रही है। आने वाले समय में यूपी न सिर्फ देश, बल्कि दुनिया के सामने एआई आधारित पब्लिक हेल्थ का मजबूत उदाहरण बन सकता है।






