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कहानी के भीतर छिपे मनुष्य को पढ़ने वाले कथाकार थे ज्ञानरंजन, इनकी कहानियों में खुद को पहचानता था समाज

कहानी को नई संवेदना और गद्य को धार देने वाले वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का 90 वर्ष की आयु में जबलपुर में निधन हो गया। नर्मदा तट के ग्वारीघाट मुक्तिधाम में आज उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है

न्यूज डेस्क, 8 जनवरी 2026:

हिंदी कहानी को नई संवेदना और गद्य को धार देने वाले ज्ञानरंजन का नाम देश के उन विरले कथाकारों में शामिल हैं, जिन्होंने साधारण दिखने वाले मध्यवर्गीय जीवन के भीतर छिपे असाधारण संघर्षों को शब्द दिए। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’, ‘अमरूद’ और ‘पिता’ जैसी कहानियों के जरिए उन्होंने न सिर्फ कथा की भाषा को बदला, बल्कि सोचने का नजरिया भी नया किया। उनके पात्र रोजमर्रा की जिंदगी से उठे हुए हैं, लेकिन उनके भीतर चलने वाले टकराव, कुंठाएं और भटकाव पूरे समाज का आईना बन जाते हैं। खासकर कहानी ‘पिता’ में ज्ञानरंजन मध्यवर्ग की उस पीढ़ी को सामने रखते हैं, जो आर्थिक दबावों और सामाजिक विरोधाभासों के बीच अपने मूल्यों से कटती चली जाती है। उनकी कहानियां मध्यवर्ग के उन पहलुओं को उजागर करती हैं, जो अक्सर अनकहे रह जाते हैं, और इसी वजह से उनका लेखन आज भी उतना ही प्रासंगिक और बेचैन करने वाला है।

हिंदी साहित्य के इस वरिष्ठ कथाकार का 90 वर्ष की आयु में बुधवार देर रात जबलपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से उम्र से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। बुधवार सुबह अचानक तबियत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां रात करीब साढ़े दस बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। ज्ञानरंजन का अंतिम संस्कार आज दोपहर जबलपुर स्थित नर्मदा तट के ग्वारीघाट मुक्तिधाम में किया गया। उनके परिवार में पत्नी सुनयना, पुत्री वत्सला और पुत्र शांतनु हैं। दोनों बच्चे जबलपुर में ही रहते हैं। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

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ज्ञानरंजन का जन्म 21 नवंबर 1936 को महाराष्ट्र के अकोला जिले में हुआ था। उनका प्रारंभिक जीवन महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में बीता। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध जी एस कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर रहे और 34 वर्षों की सेवा के बाद वर्ष 1996 में सेवानिवृत्त हुए। वर्ष 2013 में जबलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि दी थी।

ज्ञान रंजन ने वर्ष 1973 में ‘पहल’ पत्रिका की शुरुआत की, जिसके माध्यम से उन्होंने प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े लेखकों की कहानियों और कविताओं को मंच प्रदान किया। जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार गंगा चरण मिश्र ने शोक व्यक्त करते हुए कहा कि व्यंग्य साहित्य की दुनिया में हरिशंकर परसाई सबसे बड़ा नाम थे, और इसी कारण जबलपुर के अन्य साहित्यकारों को वह पहचान नहीं मिल सकी, जिसके वे हकदार थे। वहीं साहित्यकार पंकज स्वामी ने दुख जताते हुए कहा कि ज्ञानरंजन के छह कहानी संग्रह विश्वभर में प्रसिद्ध हुए और उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया।

ज्ञानरंजन का रचनाकर्म अत्यंत विविध और प्रभावशाली रहा। उनकी अनूठी गद्य रचनाओं की पुस्तक ‘कबाड़खाना’ खास तौर पर चर्चित रही। ‘फेंस के इधर और उधर’ और ‘एक कंठ विषपायी’ जैसे कहानी संग्रहों में उन्होंने मध्यवर्गीय जीवन, मानसिक द्वंद्व, अकेलापन और नैतिक संघर्ष को गहराई से चित्रित किया। उन्हें साहित्य भूषण सम्मान, सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान, शिखर सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान और ज्ञानपीठ के ज्ञानगरिमा मानद अलंकरण से सम्मानित किया गया।

ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी साहित्य के एक युग का अंत हो गया है। वे बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों, मानसिक उलझनों और सामाजिक दबावों को अपनी कहानियों का विषय बनाते रहे। उनकी लेखन शैली संवेदनशील, वैचारिक और आत्ममंथन से भरी रही। एक संपादक के रूप में भी उन्होंने नई कहानी आंदोलन को दिशा दी। चुपचाप साहित्य साधना में लगे रहने वाले ज्ञानरंजन का जाना हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।

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