
पुणे, 15 मई 2025
अनंत महादेवन द्वारा निर्देशित बहुचर्चित फिल्म फुले 25 अप्रैल को रिलीज होने के बाद लगातार सुर्खियों में है। जातिगत टकराव और ब्राह्मणवाद बनाम दलित चेतना के विवादों के बीच यह फिल्म न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक विमर्श का हिस्सा भी बन गई है। हालांकि इन बहसों में फिल्म के कुछ ऐतिहासिक और संवेदनशील पहलू छूट गए, जो अब चर्चा में आने लगे हैं।
फिल्म में महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के संघर्ष को केंद्र में रखा गया है, लेकिन इसके साथ ही विष्णुपंत थत्ते और फातिमा शेख जैसे सहयोगियों की भूमिका भी अहम रही है, जिन्हें आमतौर पर इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। फिल्म में विष्णुपंत एक ऐसे ब्राह्मण के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने समाज की परंपराओं से टकराकर फुले दंपत्ति के मिशन में साथ दिया। उन्होंने उनके स्कूल में निःशुल्क शिक्षा दी और धमकियों के बावजूद अपने संसाधनों से स्कूल को किताबें भेंट कीं।
वहीं, उस्मान शेख और उनकी बहन फातिमा शेख की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। फुले दंपत्ति जब घर से निकाले गए तो उन्होंने इन्हें अपने घर में पनाह दी। फातिमा शेख ने मुस्लिम समाज की लड़कियों को उर्दू और अंग्रेज़ी में पढ़ाना शुरू किया। फिल्म में दिखाया गया है कि वे भी अपने समाज के कट्टरपंथियों का विरोध झेलते हुए शिक्षा अभियान में जुटी रहीं।
फिल्म यह संदेश देती है कि फुले दंपत्ति का संघर्ष केवल जातिगत विद्रोह नहीं था, बल्कि यह एक समावेशी शिक्षा क्रांति थी, जिसमें विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग साथ आए। इस ऐतिहासिक तथ्य को फिल्म ने सशक्त रूप से उभारा है, जिससे यह केवल एक विवादित फिल्म नहीं, बल्कि एक प्रेरणास्रोत बनकर उभरती है।






