बाराबंकी, 19 फरवरी 2026:
किश्तों में खुदकुशी का मजा बताने का फन हो या फिर तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती, की जद्दोजहद हर एहसास को गजल गीतों में पिरोने का फन खुमार साहब (खुमार बाराबंकवी) को बखूबी आता था। पूरी दुनिया मे उर्दू गजल का परचम लहराने वाले शायर खुमार बाराबंकवी जुदा अंदाज लेकिन ताउम्र एक जैसा मिजाज रखने वाली शख्सियत थे। उनके प्रंशसकों ने आज उन्हें अपने-अपने अंदाज में याद किया।
करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करने वाले मकबूल शायर को बिछड़े 27 साल हो गए हैं लेकिन आज हम उनका शायराना सफर शुरू से जानेंगे। 15 सितम्बर 1919 उनकी पैदाइश की तारीख है। शहर के पीरबटावन में जन्मे और पड़ोस के ही सिटी कालेज में पढ़े। एक छोटे से शहर में मोहम्मद हैदर नाम का बच्चा दुबई में 1992 अपने सम्मान में जश्ने खुमार की जीनत होगा, ये इल्म किसी को नही था।
मोहम्मद हैदर को घर मे पिता व चाचा से शायराना माहौल मिला। 18-19 साल की उम्र से ही उन्होंने मंच पर कदम रख दिये। उनके तरन्नुम की कशिश व लफ्जों की सादगी ने उन्हें शहजादे से शहंशाहे गजल के मुकाम तक पहुंचा दिया। मुशायरे उनकी मौजूदगी से ही मुकम्मल माने जाते थे। उनकी गजल में जिंदगी के हर रंग थे, सुख दुख के आने-जाने को वो ऐसे बयां करते हैं कि
– अब आंखों को दरिया बनाना पड़ेगा
तबस्सुम का कर्जा चुकाना पड़ेगा
खुशी की ख्वाहिश की तड़प कैसी होती है इस पर वो कहते हैं
– मरने से पहले शक्ल ही देख लूं
ए मौत जिंदगी का पता चाहिए मुझे
इश्क से इनकार पर शक को वो चेहरे से कैसे भांपते है जरा गौर करिए
– प्यार से उनका इंतजार बरहक़ मगर
उनके लब किसलिए थरथराते रहे
आंख से गिरे आंसू से उनका गिला भी ऐसा रहता है
– एक आंसू कह गया सब हाल दिल का
मैं समझा था ये जालिम बेजबां है
जमाने पर उनका तंज भी सलीके से होता है
– इस दौर के इंसान वफ़ा भूल गए हैं
बेचारे फरिश्ते है खता भूल गए हैं
– आजार सही इश्क मगर हाय रे लज्जत
वो दर्द मिला है कि दवा भूल गए हैं
उनकी गजलों की मकबूलियत फिल्मों तक पहुंची तो 1943 से 1963 के दरमियान उन्होंने शाहजहां, बारादरी आदि कई हिट फिल्मों में तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती और साज हो तुम आवाज हूं मैं, भुला नही देना जी भुला नही देना, जैसे कर्णप्रिय गीत दिए। ये गीत आज भी गुनगुनाए जाते रहते हैं। लता मंगेशकर, तलत महमूद, शमशाद बेगम व रफी जैसे गायकों ने उनके गीतों को आवाज दी। संगीतकार नौशाद के बेहद करीब रहे खुमार साहब ने आखिरी गीत 1986 में फ़िल्म लव एंड गॉड के लिए लिखा और फिर मुंबई की ओर रुख नहीं किया।
खुमार बाराबंकवी के नाम की ये शमा जब तक जली रौशनी के साथ रौनक भी बिखेरती रही लेकिन ये पिघल भी रही थी। 1993 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा लेकिन डॉक्टरों की तमाम हिदायत के बावजूद वो दो माह बाद ही दुबई मुशायरे में गए। 19 फरवरी 1999 को ये दर्द उन्हें हमसे जुदा कर गया। एक शायर बेहद सादगी के साथ जर्रे से आफताब बना। आज भले वो हमें दिखाई न दें लेकिन उर्दू गजल में उनका आबोताब शिद्दत के साथ महसूस होता है।






