लखनऊ, 3 जनवरी 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ में कड़ाके की ठंड के बीच शनिवार को शहीद स्मारक एक बार फिर जनआंदोलन की आवाज से गूंज उठा। शहर के महिला संगठनों, छात्र-युवा समूहों, लेखकों, सांस्कृतिक संगठनों और बड़ी संख्या में जागरूक नागरिकों ने देश में बढ़ती हिंसा, नफरत और महिला-दलित विरोधी घटनाओं के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने हाल के वर्षों में सामने आई वीभत्स घटनाओं पर गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया।
इस दौरान वक्ताओं ने सावित्रीबाई फुले की जयंती के अवसर पर उन्हें याद किया और उनकी सहयोगी फातिमा शेख के योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख ने उस दौर में वंचित तबकों की महिलाओं और बेटियों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया जब समाज में शिक्षा पर कुछ वर्गों का एकाधिकार था। दोनों को ब्राह्मणवादी मानसिकता के पैरोकारों द्वारा अपमान और बहिष्कार का सामना करना पड़ा लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और सामाजिक बराबरी की लड़ाई को आगे बढ़ाया।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि आज सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रगतिशील, मानवीय और संवैधानिक मूल्यों को सांप्रदायिक ताकतों द्वारा कुचला जा रहा है। वक्ताओं के अनुसार मनुवादी मानसिकता एक बार फिर समाज में भेदभाव और नफरत का जहर घोल रही है। दुर्भाग्य से यही सोच सत्ता के शीर्ष पर बैठी है, जो महिला-विरोधी, दलित-विरोधी होने के साथ-साथ संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी है।
सभा में हाल की कई घटनाओं का उल्लेख किया गया। उनमें कुलदीप सिंह सेंगर जैसे दोषियों के समर्थन में दिए गए बयान, उत्तराखंड की अंकिता भंडारी हत्याकांड में सत्ता से जुड़े लोगों की संदिग्ध भूमिका, नितीश कुमार के मामले में एक राज्यमंत्री की टिप्पणी और आसाराम व राम-रहीम जैसे सजायाफ्ता अपराधियों को बार-बार जमानत और पैरोल मिलना शामिल है। वक्ताओं ने इन सबके पीछे राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगाया।
प्रदर्शन में बरेली, देहरादून और लखनऊ सहित कई जगहों पर नफरत के नाम पर हुई हिंसक घटनाओं की कड़ी निंदा की गई। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह सब देश की सभ्यता और विविधता के लिए खतरा है। सभा के अंत में सभी ने संकल्प लिया कि वे नफरत और ब्राह्मणवादी राजनीति के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करेंगे। प्रदर्शन में लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. रूपरेखा वर्मा, मधु गर्ग, नाइश हसन, रिजवान सहित भारतीय महिला फेडरेशन, एडवा, साझी दुनिया, स्त्री मुक्ति लीग, एपवा, एनएपीएम, इप्टा, लोकतांत्रिक लेखक संघ, एसएफआई, आइसा, नौजवान भारत सभा और कई अन्य संगठनों के प्रतिनिधि शामिल रहे।






