लखनऊ, 2 फरवरी 2026:
उत्तर प्रदेश जनजाति एवं लोक कला संस्कृति संस्थान प्रदेश की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। संस्थान प्रदेश की विभिन्न जनजातियों से जुड़े पारंपरिक आभूषणों और दुर्लभ बर्तनों के संरक्षण के साथ-साथ उनके प्रचार-प्रसार का भी काम कर रहा है। इस पहल के जरिए न सिर्फ पुरानी विरासत को बचाया जा रहा है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से रूबरू कराया जा रहा है।
संस्थान के माध्यम से थारू, बुक्सा, गोंड और बैगा समेत कई जनजातियों के 500 से अधिक पारंपरिक आभूषणों और बर्तनों का संरक्षण किया जा रहा है। इन कलाकृतियों को प्रदर्शनियों में प्रदर्शित कर युवाओं को यह बताया जा रहा है कि उनकी सांस्कृतिक जड़ें कितनी समृद्ध और विविध हैं।
जनजातीय आभूषण को दिया जा रहा आधुनिक रूप
प्रदेश की जनजातियों के आभूषण केवल सजावट का साधन नहीं हैं, बल्कि उनकी परंपरा, जीवनशैली और कला-कौशल का आईना भी हैं। ये आभूषण पूरी तरह हाथ से बनाए जाते हैं। गोटा चांदी, पुराने सिक्के, मनके, तांबा, पीतल, लकड़ी, हड्डी और सीप जैसी सामग्रियों से तैयार ये गहने सदियों पुराने हुनर की कहानी कहते हैं। भट्टी में धातु को गर्म कर तार और चादरों में ढालना, फिर हाथों से उन्हें आकार देना। यह पूरी प्रक्रिया जनजातीय शिल्पकारों की मेहनत और हुनर को दर्शाती है। हंसली, पायल, करधनी, कड़े, झुमकी, हार, अंगूठियां, बाजूबंद और मंगलसूत्र जैसे आभूषण आज भी जनजातीय समाज का अहम हिस्सा हैं। अब इन आभूषणों के आधुनिक रूप भी तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें युवा पीढ़ी पारंपरिक ही नहीं, बल्कि एथनिक और वेस्टर्न पहनावे के साथ भी अपना रही है।
पारंपरिक बर्तनों का भी हो रहा संरक्षण
संस्थान का काम सिर्फ आभूषणों तक सीमित नहीं है। थारू, बुक्सा, अगरिया, खरवार और सोनभद्र क्षेत्र की जनजातियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पीतल, तांबे और मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों को भी संरक्षित किया जा रहा है। धातु पात्र, मिट्टी के मृदभांड और जंगली लौकी से बनी ‘तुंबी’ आज भी जनजातीय जीवनशैली की झलक पेश करते हैं। अगरिया जनजाति धातु शिल्प के लिए जानी जाती है, जबकि थारू जनजाति चावल से पेय बनाने में मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करती है। संस्थान इन सभी वस्तुओं की समय-समय पर प्रदर्शनी लगाकर उन्हें बड़े मंच तक पहुंचा रहा है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश दिवस-2026 और जनजातीय भागीदारी महोत्सव जैसे आयोजनों के जरिए जनजातीय शिल्पकारों को मंच और सम्मान दिया गया, जिससे प्रदेश की जनजातीय संस्कृति को नई पहचान और नई ऊंचाई मिल रही है।






