लखनऊ, 2 जनवरी 2026:
किताबें बीते जमाने, समाज और इंसान की कहानी कहती हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो खुद एक चलती-फिरती किताब बन जाते हैं। सफदर हाशमी ऐसे ही कलाकार थे। 2 जनवरी 1989 भारतीय रंगमंच के इतिहास का वह दर्दनाक दिन है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। 1 जनवरी को सफदर हाशमी अपने साथियों के साथ मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का मंचन कर रहे थे। नाटक के दौरान उनकी आवाज दबाने की कोशिश की गई, हमला हुआ और गंभीर रूप से घायल सफदर हाशमी ने 2 जनवरी को दम तोड़ दिया। यह सिर्फ एक कलाकार की मौत नहीं थी, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला था।
आराम की जिंदगी छोड़ चुना संघर्ष का रास्ता
12 अप्रैल 1954 को दिल्ली में जन्में सफदर हाशमी ने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित
सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए की पढ़ाई की थी और उन्हें एक अच्छी नौकरी भी मिली थी। इसके बावजूद उन्होंने सुविधाजनक जीवन को छोड़कर मजदूरों के हक की लड़ाई को अपना उद्देश्य बनाया। राजनीति और सामाजिक आंदोलन से जुड़ते हुए उन्होंने नुक्कड़ नाटक को जनआंदोलन का रूप दिया। सड़क, चौराहे और मजदूर बस्तियां उनका मंच बनीं। यही नाटक उनकी पहचान बना और यही उनकी शहादत का कारण भी।

चुनावी माहौल में हुआ हमला
जनवरी 1989 में चुनाव का माहौल था। सफदर हाशमी अपनी मंडली ‘जनम’ के साथ माकपा उम्मीदवार रामानंद झा के समर्थन में नुक्कड़ नाटक कर रहे थे। इसी दौरान कांग्रेस के तत्कालीन उम्मीदवार मुकेश शर्मा का काफिला वहां पहुंचा। रास्ता छोड़ने को लेकर हुई बहस ने देखते ही देखते हिंसक रूप ले लिया। मुकेश शर्मा के समर्थकों ने कलाकारों पर हमला कर दिया, जिसमें सफदर हाशमी को खास तौर पर निशाना बनाया गया। उन्हें गंभीर हालत में दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 34 वर्ष की उम्र में उन्होंने अगली सुबह अंतिम सांस ली।
मौत के बाद भी जारी रहा नाटक
सफदर हाशमी की मौत के बाद भी उनकी आवाज खामोश नहीं हुई। अंतिम संस्कार के दौरान दिल्ली की सड़कों पर 15 हजार से अधिक लोग उमड़ पड़े, जो उनकी लोकप्रियता और विचारों की ताकत को दर्शाता है। शहादत के 48 घंटे बाद ही 4 जनवरी को उनकी पत्नी मौलीश्री और साथियों ने अधूरे नाटक ‘हल्ला बोल’ का मंचन पूरा किया। यह नाटक सिर्फ प्रस्तुति नहीं, बल्कि प्रतिरोध और श्रद्धांजलि का प्रतीक बन गया।

14 साल बाद मिला न्याय
सफदर हाशमी की हत्या के मामले में लंबी कानूनी लड़ाई चली। घटना के 14 वर्ष बाद वर्ष 2003 में गाजियाबाद की अदालत ने अपना फैसला सुनाया। अदालत ने कांग्रेस नेता मुकेश शर्मा सहित कुल 10 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। संपन्न परिवार से आने के बावजूद मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ने वाले सफदर हाशमी आज भी जननाट्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतीक माने जाते हैं।






