एमएम खान
मोहनलालगंज (लखनऊ), 13 अप्रैल 2026:
इन दिनों ग्रामीण इलाकों में महुआ का सीजन पूरे शबाब पर है। आजीविका की जद्दोजहद में जुटे गरीब परिवार सुबह होते ही बागों का रुख कर रहे हैं। महिलाएं, पुरुष और बच्चे मिलकर पेड़ों से गिरे महुआ के फूल बीनते नजर आते हैं। कड़ी मेहनत से एक-एक फूल इकट्ठा कर उसे सुखाया जाता है और बाद में व्यापारियों को बेचकर घर का खर्च चलाया जाता है।
ग्रामीणों के लिए यह समय बेहद अहम होता है, क्योंकि करीब दो से तीन महीने तक चलने वाले इस काम से पूरे साल के लिए अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। महुआ के फूलों के बाद पेड़ों में लगने वाले फल, जिन्हें स्थानीय भाषा में गुल्लू कहा जाता है, उन्हें भी तोड़कर बेचा जाता है।
बाग में अपनी पत्नी सावित्री के साथ महुआ बीन रहे वीरेन्द्र बताते हैं कि रातभर पेड़ों से फूल गिरते रहते हैं। सुबह 6 बजे से दोपहर तक परिवार के साथ बाग में रहकर एक-एक फूल बीनते हैं। लगातार 2-3 महीने की मेहनत के बाद फूल और फल इकट्ठा कर बेचने से रोजी-रोटी का इंतजाम हो जाता है, जिससे काफी राहत मिलती है।

महुआ को ग्रामीण कुदरत का वरदान मानते हैं। इसके फूल और फल दोनों ही रोजगार का जरिया बनते हैं। लोग चिलचिलाती धूप में भी बिना थके काम करते हैं और महुआ को घरों के आंगन में सुखाकर तैयार करते हैं। सूखने के बाद इसे बाजार में बेच दिया जाता है, जिससे गरीब परिवारों को अच्छी आय मिलती है।
महुआ सिर्फ आजीविका का साधन ही नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद फायदेमंद है। यह आयरन, कैल्शियम, विटामिन और फाइबर से भरपूर होता है। इसके सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं, खून की कमी दूर होती है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। साथ ही यह पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने, थकान कम करने और जोड़ों के दर्द में राहत देने में भी मददगार माना जाता है।
ग्रामीण महिलाओं के मुताबिक महुआ के सूखे फूलों को सीधे या दूध में उबालकर खाया जाता है। इससे लड्डू, पूरी, हलवा और खीर जैसे कई पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। वहीं महुआ के बीजों से निकला तेल खाने और त्वचा की देखभाल में इस्तेमाल होता है।
निगोहां के रहने वाले सूरज बताते हैं कि वह रोज सुबह परिवार के साथ महुआ बीनने जाते हैं और अधिक से अधिक संग्रह करने की कोशिश करते हैं। फिलहाल सूखे महुआ का दाम 35 से 40 रुपये प्रति किलो के बीच चल रहा है। हालांकि अभी अधिकतर लोग महुआ को सुखाने और जमा करने में लगे हैं। हर सीजन में एक परिवार को करीब 40 से 50 हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है, जो उनके लिए बड़ा सहारा साबित होती है।






