नई दिल्ली, 4 दिसंबर 2025 :
बचपन में भुखमरी, भाई की मौत और चूहों भरे रास्तों से गुजरना एक बच्चे की रोजमर्रा की चुनौती होती थी। दब्बू और कमजोर दिखने वाला यह बच्चा जीवन की कठिनाइयों से न हारते हुए जूडो और मार्शल आर्ट में माहिर बन गया। स्ट्रीट फाइटिंग और संघर्ष ने उसकी रग-रग में बहादुरी और रणनीति डाल दी। इसी बच्चे ने सीखा कि जब रास्ता बंद हो तो पलटकर हमला करना ही जीत का रास्ता है। आज वही बच्चा जिसका नाम व्लादिमीर पुतिन है, जो दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं।

7 अक्तूबर 1952 को लेनिनग्राद (वर्तमान में सेंट पीटर्सबर्ग, जो रूस में है) के एक बेहद कमजोर अस्पताल में व्लादिमीर पुतिन का जन्म हुआ, जहां कई बच्चे जन्म के तुरंत बाद ही जीवन की जंग हार जाते थे। बचपन में पुतिन ने अपने दो बड़े भाइयों को भुखमरी और बीमारी से खो दिया। कठिन हालात ने उन्हें मजबूत बनाया। जासूसी की रोमांचक कहानियों ने उनके दिमाग में खुफिया दुनिया की चाह पैदा की। कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित पुतिन ने कानून की पढ़ाई के बाद 1975 में रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी में भर्ती होकर लेफ्टिनेंट कर्नल तक का सफर तय किया और 1991 तक सोवियत संघ के टूटने तक काम किया। आइए विस्तार से जानते हैं विश्व राजनीति के सबसे प्रभावशाली लीडर का सफर…
रूस में उथल-पुथल…और पुतिन का उदय
दुनिया उन्हें एक रहस्यमयी, रणनीतिक और बेहद ताकतवर राष्ट्रपति के रूप में देखती है। लेकिन सवाल ये है कि उनके लंबे कार्यकाल में रूस कितना बदला? कितना आगे बढ़ा? और किन क्षेत्रों में रूस आज शक्तिशाली देशों की पंक्ति में खड़ा है? सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस अव्यवस्था, आर्थिक बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता के काले दौर से गुजर रहा था। साल 2000 में जब पुतिन पहली बार राष्ट्रपति बने, तो देश की टूटी हुई व्यवस्था को फिर से खड़ा करना, अर्थव्यवस्था को संभालना और दुनिया के मंच पर रूस की डगमगाई हुई साख को लौटाना सबसे बड़ी चुनौती थी। हालांकि उनकी नीतियों को लेकर मतभेद जरूर हैं, लेकिन यह बात साफ है कि आज रूस कई अहम सेक्टरों में एक प्रभावी वैश्विक शक्ति बन चुका है। और भारत के लिए यह खास इसलिए है क्योंकि दोनों देशों की साझेदारी रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष और रणनीतिक सहयोग पर टिकी है।
पुतिन ने रूस को कैसे बनाया एक नियंत्रित शक्ति?
1990 के दशक में रूस राजनीतिक अस्थिरता और निजीकरण की अराजकता में उलझा हुआ था। सत्ता संभालते ही पुतिन ने दो स्पष्ट लक्ष्य तय किए-केंद्र की पकड़ मजबूत करना और संस्थानों और राज्य की साख को पुनर्जीवित करना। उन्होंने क्षेत्रीय गवर्नरों पर नियंत्रण बढ़ाया, सुरक्षा ढांचे को मजबूत किया और रूस को फिर से महान बनाने का नारा दिया। आलोचक इसे लोकतंत्र के संकुचन के रूप में देखते हैं, लेकिन समर्थकों का कहना है कि उस समय रूस को स्थिरता के लिए इसी अनुशासन की जरूरत थी। नतीजा यह निकला कि रूस अस्थिरता से निकलकर एक अधिक केंद्रीकृत, तेज और संगठित राष्ट्रीय राज्य के रूप में उभरा।
तेल-गैस का बूम और रूस की आर्थिक रीबिल्डिंग
पुतिन के शुरुआती कार्यकाल में तेल और गैस की ऊंची कीमतों ने रूस को बड़ी राहत दी। इन्हीं संसाधनों से विदेशी कर्ज घटा, सोने और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुए और मध्यम वर्ग को उन्नति का मौका मिला। रूस आज दुनिया के सबसे बड़े गैस निर्यातकों में शामिल है और तेल उत्पादन में भी शीर्ष देशों में गिना जाता है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने दबाव तो बढ़ाया, लेकिन रूस ने एशिया खासकर भारत और चीन के साथ ऊर्जा साझेदारी बढ़ाकर स्थिति को काफी हद तक संतुलित रखा।
रक्षा और रणनीति में रूस है सबसे ऊंची आवाज
अगर दुनिया किसी क्षेत्र में रूस की सबसे ज्यादा ताकत मानती है, तो वह है रक्षा और रणनीतिक तकनीक। सोवियत दौर की तकनीकी धरोहर को पुतिन ने आधुनिक रूप दिया। रूस आज भी परमाणु हथियार क्षमता में अमेरिका के बराबर, मिसाइल तकनीक,एयर डिफेंस, फाइटर जेट, टैंक, पनडुब्बी और साइबरवारफेयर के क्षेत्र में अग्रणी शक्ति है।
भारत-रूस रक्षा साझेदारी हुई और मजबूत
पुतिन के दौर में दोनों देशों के बीच साझेदारी नई ऊंचाइयों पर पहुंची। जिनमें ब्रह्मोस मिसाइल एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम, सुखोई और मिग का संयुक्त उत्पादन और टी-90 टैंकों में सहयोग शामिल है। पुतिन की नीति हमेशा यह रही कि भारत जैसे भरोसेमंद साझेदार को उच्च-स्तरीय रक्षा तकनीक दी जाए, ताकि दोनों देशों की सामरिक स्वतंत्रता बनी रहे और पश्चिमी दबावों का संतुलन कायम रहे।
पुतिन का दुनिया को कई ध्रुवों से चलाने का प्रयास
पुतिन बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के सबसे बड़े समर्थक हैं। उनका मानना है कि दुनिया एक या दो महाशक्तियों के इशारे पर नहीं चलनी चाहिए। इसी सोच के तहत रूस ने ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीक- उभरती राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं का एक संघ यानी (BRICS) को मजबूत किया। इसके अलावा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में सक्रिय भूमिका निभाई। अफ्रीका, मध्य-पूर्व, एशिया और लैटिन अमेरिका में अपनी मौजूदगी बढ़ाई। भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह भी खुद को एक स्वतंत्र वैश्विक ध्रुव के रूप में देखता है। यही वजह है कि ब्रिक्स और SCO भारत-रूस साझेदारी को और वजन देते हैं। यूक्रेन संकट के बाद भी रूस ने एशिया, ऊर्जा कूटनीति और ग्लोबल साउथ की रणनीति के जरिए खुद को अलग-थलग होने से बचाए रखा।
ताकत के साथ भी रूस के सामने कौन सी हैं चुनौतियां?
हालाँकि पुतिन का रूस कई मोर्चों पर मजबूत है, लेकिन चुनौतियाँ भी गहरी हैं। अर्थव्यवस्था का ऊर्जा पर ज्यादा निर्भर होना, जनसंख्या में कमी, युवा और कुशल लोगों का पलायन, लोकतंत्र और मानवाधिकारों को लेकर आलोचना और पश्चिमी प्रतिबंधों का दबाव जैसी चुनौतियां शामिल हैं। इसके अलावा फाइनेंस, एविएशन, हाई-टेक और आधुनिक तकनीकों पर प्रतिबंधों ने रूस के लिए कई मुश्किलें पैदा की हैं।
कुल मिलाकर रूस आज किस रूप में खड़ा है?
इन सारी चुनौतियों के बावजूद, पुतिन के नेतृत्व में रूस सैन्य-सामरिक शक्ति, ऊर्जा सुपरपावर और स्वतंत्र कूटनीतिक ध्रुव के रूप में दुनिया में अपनी जगह मजबूती से बनाए हुए है। रूस गिरा भी, टूटा भी…लेकिन पुतिन के दौर में एक ऐसी शक्ति के रूप में वापस खड़ा हुआ जिसे नजरअंदाज करना आज किसी भी देश के लिए आसान नहीं है।





