
न्यूज डेस्क, 1 जुलाई 2026:
आज 1 जुलाई को देशभर में नेशनल डॉक्टर्स डे (राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस) मनाया जा रहा है। यह दिन उन डॉक्टरों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है जो दिन-रात लोगों की जान बचाने और उन्हें स्वस्थ जीवन देने के लिए समर्पित रहते हैं। इस साल राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस की थीम ‘बिहाइंड द मास्क: हू हील्स द हीलर्स’ एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल उठाती है कि जो डॉक्टर दूसरों का इलाज करते हैं उनकी देखभाल कौन करता है?
बढ़ रहीं क्रॉनिक बर्नआउट जैसी समस्याएं
मेडिकल इमरजेंसी के कारण डॉक्टरों को अक्सर लगातार काफी घंटे तक ड्यूटी करनी पड़ती है। नींद की कमी और लगातार काम उनकी शारीरिक क्षमता को निचोड़ देता है। पिछले कुछ वर्षों में यह महसूस किया गया है कि स्वास्थ्यकर्मियों में तनाव, चिंता और बर्नआउट जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अगर डॉक्टर स्वयं स्वस्थ और मानसिक रूप से संतुलित नहीं रहेंगे तो वे मरीजों को भी अपनी सर्वोत्तम सेवाएं नहीं दे पाएंगे।

भावनात्मक और मानसिक तनाव
गंभीर रूप से बीमार मरीजों का इलाज करना, उनके परिजनों की उम्मीदों को संभालना और किसी की मृत्यु पर दुख का सामना करना डॉक्टरों पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर छोड़ता है। वे इस तनाव को अक्सर अपने मास्क के पीछे छिपा लेते है। इसके बावजूद उन्हें अगले ही पल किसी दूसरे मरीज और उसके परिवार के सामने पूरी मजबूती और उम्मीद के साथ खड़ा होना पड़ता है। लगातार काम का दबाव और भावनात्मक बोझ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकता है।
कार्यस्थल पर बढ़ती हिंसा
हाल के वर्षों में मरीजों के परिजनों द्वारा डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के साथ मारपीट की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार बुनियादी ढांचे की कमी और इलाज के लंबे खर्च के कारण पैदा होने वाला गुस्सा सीधे डॉक्टरों पर निकलता है जिससे वे लगातार डर के साए में काम करते हैं।
ऐसे हो सकती है हीलर्स की देखभाल
डॉक्टरों के काम के घंटे तय होने चाहिए। उनके लिए अस्पतालों में प्रॉपर रेस्ट रूम और तनाव-मुक्त करने वाले जोन होने चाहिए। हर मेडिकल कॉलेज और बड़े अस्पताल में डॉक्टरों और रेजिडेंट्स के लिए काउंसलिंग और थेरेपी की व्यवस्था होनी चाहिए जहां वे बिना किसी हिचकिचाहट के अपने मानसिक तनाव को साझा कर सकें।
कड़े सुरक्षा कानून और उनका पालन
डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अस्पतालों में सख्त सुरक्षा घेरा और हिंसा करने वालों के खिलाफ ठोस कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। मरीजों और उनके परिवारों को यह समझना होगा कि चिकित्सा विज्ञान की भी अपनी सीमाएं हैं। डॉक्टर मरीज को ठीक करने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं लेकिन वे चमत्कारी देवता नहीं हैं।
एक मजबूत और स्वस्थ समाज की नींव केवल आधुनिक अस्पतालों या मशीनों पर नहीं बल्कि डॉक्टरों की मानसिक और शारीरिक मजबूती पर टिकी होती है। इस राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर डॉक्टरों को धन्यवाद करने के साथ उनके प्रति अपनी सहानुभूति भी बढ़ाएं। जब समाज अपने हीलर्स की परवाह करना शुरू करेगा तभी सही मायनों में मास्क के पीछे छिपा इंसान भी खुलकर सांस ले पाएगा।






