
लखनऊ/मथुरा, 3 सितंबर 2026:
जन्माष्टमी पर मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच ब्रज की यात्रा अब मंदिरों की चौखट से निकलकर गांवों तक पहुंचने लगी है। मथुरा से कुछ दूरी पर स्थित जैत गांव इसका सबसे दिलचस्प उदाहरण बनकर उभर रहा है। यहां श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन के साथ अब तुलसी की माला बनाने, लड्डू गोपाल की पोशाक तैयार करने, मिट्टी के बर्तन बनाने, ब्रज के व्यंजन चखने और ग्रामीण परिवारों के साथ रहकर गांव की जिंदगी को करीब से महसूस कर सकते हैं।
पीढ़ियों पुरानी है तुलसी माला बनाने की परंपरा
जैत में तुलसी माला बनाने की परंपरा पीढ़ियों पुरानी है। गांव के 2,000 से अधिक परिवार इस शिल्प से जुड़े हैं। जन्माष्टमी के मौके पर तुलसी मालाओं की मांग और बढ़ जाती है। श्रद्धालु इन्हें जप के लिए इस्तेमाल करते हैं। कंठी के रूप में पहनते हैं और धार्मिक स्मृति के तौर पर भी खरीदते हैं। छोटी तुलसी मालाओं और आभूषणों का इस्तेमाल लड्डू गोपाल के श्रृंगार में भी होता है।
पारंपरिक शिल्प को पर्यटन अनुभव में बदलने की हो रही कोशिश
अब इसी पारंपरिक शिल्प को पर्यटन अनुभव में बदलने की कोशिश हो रही है। पर्यटक तुलसी के खेत देख सकते हैं। सूखी तुलसी की डंडियों से मोती तैयार करने से लेकर उनमें छेद करने और माला पिरोने तक की प्रक्रिया समझ सकते हैं। इतना ही नहीं, कारीगरों की मदद से अपनी तुलसी माला खुद तैयार करने का मौका भी मिलता है।
महिलाओं को इस गतिविधि से जोड़ने के लिए गिरधारी तुलसी माला महिला समूह और ब्रजरानी तुलसी माला महिला समूह काम कर रहे हैं। जैत की मालाएं मथुरा-वृंदावन के अलावा दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, मुंबई और कोलकाता तक पहुंच रही हैं। गांव निवासी संजय सिंह ने मालाओं को बड़े बाजारों तक पहुंचाकर करीब 10 लाख रुपये की बिक्री की है।

शिल्प के साथ जैत में ब्रज संस्कृति का पूरा अनुभव देने की तैयारी है। यहां पर्यटक लड्डू गोपाल की पोशाक बनाना, मिट्टी के बर्तन तैयार करना, भजन सुनना और कृष्ण के बाल स्वरूप से जुड़ी लोककथाएं जानना सीख सकते हैं। स्थानीय शाकाहारी भोजन और ग्रामीण परिवारों के साथ बातचीत भी इस अनुभव का हिस्सा है।
पर्यटकों की बढ़ती संख्या ने बढ़ाई संभावनाएं
ब्रज में पर्यटन के तेजी से बढ़ते दायरे ने जैत जैसे गांवों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। वर्ष 2025 में करीब 10.24 करोड़ पर्यटक मथुरा पहुंचे, जबकि 2022 में यह संख्या लगभग 6.53 करोड़ थी। वर्ष 2026 के पहले तीन महीनों में ही करीब 1.90 करोड़ पर्यटक मथुरा पहुंच चुके हैं। 2025 की जन्माष्टमी पर मथुरा-वृंदावन में त्योहार वाले दिन शाम तक करीब 60 लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज हुई थी।

सरकार अब इसी बड़ी पर्यटक आबादी का कुछ हिस्सा गांवों तक ले जाने पर जोर दे रही है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के मुताबिक जैत यह दिखाता है कि ब्रज की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को ग्रामीण आजीविका से जोड़ा जा सकता है। होमस्टे, शिल्प कार्यशालाओं और स्थानीय अनुभवों के जरिए महिला कारीगरों, किसानों, गाइडों, मेजबानों और छोटे उद्यमों के लिए रोजगार के अवसर तैयार किए जा रहे हैं।
इस बदलाव में तकनीक भी बन रही मददगार
तकनीक भी इस बदलाव में मददगार बन रही है। आईआईटी दिल्ली के रूरल टेक्नोलॉजी एक्शन ग्रुप ने तुलसी के मोती बनाने और उनमें छेद करने की प्रक्रिया आसान करने के लिए बेहतर उपकरण विकसित किया है। विश्व बैंक की सहायता वाले उत्तर प्रदेश प्रो-पुअर टूरिज्म डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत तुलसी रिसोर्स सेंटर, भंडारण, बिक्री केंद्र, प्रशिक्षण और खेती के लिए सोलर पंप जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। ब्रज में करीब 3,000 कारीगरों को तुलसी माला और राधा-कृष्ण की पोशाक जैसे शिल्पों का प्रशिक्षण दिया गया है।
होमस्टे में मिलेगा गांव का स्वाद
जैत में पांच होमस्टे विकल्प चिन्हित किए गए हैं। अरन्या कॉटेज फार्म स्टे और समालिया फार्म्स में फार्म अनुभव और स्थानीय शाकाहारी भोजन मिल सकता है। वहीं श्री होमस्टे, श्री हरि निवास होमस्टे और तेजवीर होमस्टे में घर का बना खाना, ग्रामीण परिवारों से संवाद और शिल्प कार्यशालाएं शामिल हैं। श्री होमस्टे संचालक केशव किशोर गौतम जापान, श्रीलंका और इटली समेत कई देशों के पर्यटकों की मेजबानी कर चुके हैं।

अप्रैल 2026 में टूर ऑपरेटरों, ट्रैवल राइटर्स और डिजिटल क्रिएटर्स ने जैत का दौरा किया। जुलाई में श्रीलंका के प्रतिनिधिमंडल ने भी गांव के शिल्प, खान-पान और आतिथ्य का अनुभव लिया। गांव में जय कुंड और कालिया नाग मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी हैं।
अपर मुख्य सचिव, पर्यटन, संस्कृति एवं धार्मिक कार्य अमृत अभिजात के अनुसार, जैत में मौजूद शिल्प, लोक परंपराओं और सामुदायिक ज्ञान को भोजन, कार्यशालाओं और होमस्टे से जोड़कर छोटी-सी गांव यात्रा को भी यादगार अनुभव बनाया जा सकता है। इससे पर्यटकों का खर्च सीधे ग्रामीण परिवारों तक पहुंच सकेगा। इस जन्माष्टमी जैत में कृष्ण की नगरी का एक नया रंग दिखाई दे रहा है। मंदिर के दर्शन के बाद यात्रा खत्म नहीं होती बल्कि तुलसी की खुशबू, मिट्टी की सोंधी महक, ब्रज के स्वाद और गांव की मेहमाननवाजी के साथ शुरू होती है।





