University Lucknow में गूंजा सवाल- महिलाओं की सुरक्षा या उनकी आजादी पर पहरा? पुलिस ने रोका विरोध मार्च
‘शी स्पीक्स लखनऊ’ के बैनर तले छात्राओं और महिला कार्यकर्ताओं ने उठाई आवाज, दिल्ली में महिला पत्रकारों से कथित यौन उत्पीड़न की निष्पक्ष जांच और संस्थागत जवाबदेही की मांग

लखनऊ, 12 अक्टूबर 2026:
महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगाने के खिलाफ सोमवार को लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्राओं, महिला कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने जोरदार आवाज उठाई। ‘शी स्पीक्स लखनऊ’ (She Speaks Lucknow) के बैनर तले आयोजित प्रदर्शन में महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन उत्पीड़न और भेदभाव के मामलों पर नाराजगी जताई गई। प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि आखिर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बजाय उनकी आवाजाही और विरोध के अधिकार को सीमित क्यों किया जाता है?
प्रदर्शनकारियों ने विश्वविद्यालय के गेट नंबर-3 से परिवर्तन चौक तक विरोध मार्च निकालने का आह्वान किया था लेकिन लखनऊ पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद गेट पर ही विरोध सभा आयोजित की गई। इसमें दिल्ली, जमुई, लेडी श्रीराम कॉलेज (एलएसआर) और लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) में सामने आई हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की सुरक्षा तथा जवाबदेही का मुद्दा उठाया गया।
‘हिंसा के खिलाफ कार्रवाई हो, महिलाओं की आजादी पर पाबंदी नहीं’
विरोध सभा को शी स्पीक्स लखनऊ की संविधा, सीमा, इशिका, वृद्धि, भगत सिंह छात्र मोर्चा की आकांक्षा आजाद तथा अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) की सरोजिनी बिष्ट और कृष्णा अधिकारी ने संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा को अलग-अलग आपराधिक घटनाओं के रूप में देखकर उसके व्यापक सामाजिक कारणों की अनदेखी नहीं की जा सकती। परिवार, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जीवन में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच भेदभाव और उत्पीड़न को बढ़ावा देती है।

उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनके पहनावे, समय और आवाजाही को नियंत्रित करना समस्या का समाधान नहीं है। महिलाओं को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी राज्य और संस्थानों की है न कि उनकी स्वतंत्रता सीमित करने की।
दिल्ली में महिला पत्रकारों के आरोपों पर निष्पक्ष जांच की मांग
वक्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार पर भी चिंता जताई। उन्होंने तीन महिला पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिसकर्मियों पर लगाए गए कथित यौन उत्पीड़न के आरोपों का उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की। इन शिकायतों की जांच दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को सौंपी गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए 8 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा पर जोर
प्रदर्शनकारियों ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा और यौन उत्पीड़न के मामलों में त्वरित जांच, शिक्षण संस्थानों में प्रभावी एवं पीड़िता-केंद्रित शिकायत निवारण व्यवस्था और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार की रक्षा की मांग की। वक्ताओं ने कहा कि महिलाओं को राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने, विरोध प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग करने और सार्वजनिक जीवन में अपनी बात रखने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

विरोध सभा का समापन पितृसत्तात्मक हिंसा, संस्थागत अन्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों पर पाबंदियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखने के संकल्प के साथ हुआ। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि महिलाओं को केवल सुरक्षित रहने का नहीं अपितु बिना भय और भेदभाव के स्वतंत्र जीवन जीने का भी अधिकार है।






