रिश्तों की खौफनाक टूटन… पिता को मारी गोली, शव के टुकड़े कर फेंके… इस बेटे का दुस्साहस जान खड़े हो जाएंगे रोंगटे
लखनऊ के आशियाना इलाके में हुई वारदात, विवाद के दौरान शराब कारोबारी एवं पैथालॉजी संचालक को बेटे ने किया शूट, शव के टुकड़े किए, धड़ को नीले ड्रम में छिपाया, हाथ-पैर दूसरे इलाके में फेंके
लखनऊ, 24 फरवरी 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ के आशियाना इलाके में हुई एक घटना ने पूरे शहर को सन्न कर दिया। यह वारदात किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसी लगती है लेकिन यह हकीकत है। …और उससे भी ज्यादा डरावनी। शराब कारोबारी और पैथालॉजी संचालक मानवेंद्र सिंह (50) की हत्या उनके ही बेटे अक्षत ने कर दी। पढ़ाई का दबाव, असफलता का डर और रिश्तों में पनपती चुप्पी को वारदात की वजह बताया जा रहा है।
बारहवीं के बाद नीट की तैयारी कर 21 साल का अक्षत दो बार असफल हो चुका था। घर में पिता का सपना था कि बेटा डॉक्टर बने। दूसरी ओर बेटे के भीतर थकान, निराशा और गुस्सा उबल रहा था। गत 20 फरवरी की भोर में पिता-पुत्र के बीच फिर वही बात छिड़ी। बहस बढ़ी, शब्द तल्ख हुए और पल भर में जिंदगी बदल गई। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में सामने आया कि घर में रखी लाइसेंसी राइफल से गोली चली और मानवेंद्र सिंह की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना के वक्त घर में मौजूद छोटी बहन अपने कमरे में सो रही थी। गोली की आवाज सुनकर जब वह बाहर आई, तो उसके सामने पिता का निश्चल शरीर पड़ा था। एक ऐसा दृश्य जिसे कोई भी उम्र भर भूल नहीं पाता। इसके बाद जो हुआ वह और भी भयावह है। डर और घबराहट में अक्षत ने शव को छिपाने की कोशिश की। पहले कार से गोमती में फेंकने का विचार आया लेकिन अकेले वजन संभाल नहीं पाया। फिर आरी खरीदकर शव के टुकड़े किए। हाथ-पैर सदरौना इलाके में फेंके गए और धड़ को नीले ड्रम में छिपा दिया गया।
पड़ोसियों की हलचल देख कर अक्षत और घबरा गया। उसने पिता के दोस्त सोनू को फोन कर आत्महत्या की झूठी कहानी सुनाई। लेकिन सवालों के सामने वह टूट गया। सच सामने आते ही पुलिस हरकत में आई और फोरेंसिक टीम ने घर से अहम सबूत जुटाए। डीसीपी विक्रांत वीर के मुताबिक मामले की कई कड़ियों की जांच जारी है।
यह घटना उस दबाव की कहानी भी है जो कई घरों में चुपचाप पल रहा है। नीट जैसी परीक्षाएं युवाओं पर भारी मानसिक बोझ डालती हैं। असफलता को परिवार कई बार दबाव में बदल देता है। ऐसे में संवाद की जगह टकराव ले लेता है। मानवेंद्र अपने बेटे को समझाना चाहते थे लेकिन समझाने की भाषा और बेटे की मनःस्थिति के बीच की दूरी बढ़ती चली गई।

लखनऊ की यह घटना बताती है कि सफलता की होड़ में हम अपने बच्चों के भीतर टूटते भरोसे को देख नहीं पा रहे। परिवार के भीतर संवाद की कमी, अपेक्षाओं का बोझ और असफलता का डर मिलकर रिश्तों को खौफनाक मोड़ तक ले जा सकते हैं।






