बाराबंकी, 19 मार्च 2026:
एक छोटे से गांव में रहने वाला अरुण कुमार इन दिनों जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है। एक तरफ बीमार मां-बाप की देखभाल, दूसरी तरफ घर की जिम्मेदारी, और अब गैस सिलेंडर के लिए भी संघर्ष।
ये हकीकत है ब्लॉक बंकी के तिंदोला गांव में रहने वाले अरुण की। वो शाहजहांपुर में माली का काम करता है। परिवार की हालत ऐसी है कि मां ब्रेन हैमरेज के बाद बिस्तर पर है और पिता कैंसर से जूझ रहे हैं। दोनों उठने-बैठने की हालत में नहीं हैं।
घर में खाना बनाने के लिए गैस खत्म हो गई, तो अरुण को काम छोड़कर गांव लौटना पड़ा।

उसने पहले ही सिलेंडर बुक करा रखा था, लेकिन कई दिन बीतने के बाद भी डिलीवरी नहीं मिली।
बुधवार तड़के जब ज्यादातर लोग सो रहे थे, अरुण सुबह करीब 2 बजे घर से निकला। अंधेरे में अकेले करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर वह गैस एजेंसी पहुंचा, ताकि लाइन में सबसे आगे लग सके। वह सुबह 3 बजे ही वहां पहुंचकर खड़ा हो गया।
अरुण बताता है कि घर की हालत ऐसी है कि बिना गैस के गुजारा नहीं हो सकता। मां-बाप खुद से कुछ कर नहीं सकते, ऐसे में उनके लिए समय पर खाना बनाना जरूरी है। उस पर सिर्फ बीमार माता-पिता ही नहीं, बल्कि दो छोटी बेटियों की पढ़ाई और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी है। ऐसे में हर दिन का संघर्ष उसके लिए और भारी होता जा रहा है। वो सुपरवाइजर है। एक दिन की छुट्टी ली हैं इसीलिए भोर में यहां आ गया अब सिलेंडर लेकर ही जायेगा।

अरुण ने बताया कि चार से पांच दिन पहले सिलेंडर बुक कराया था, लेकिन हर बार खाली हाथ लौटना पड़ा। मजबूरी में उसे आधी रात यानी एजेंसी खुलने से सात घंटे पहले सबसे पहले आ गया ताकि लाइन में वो सबसे आगे रहे। अरुण की तकलीफ और फिक्र बताती है कि प्रशासनिक मशीनरी गैस एजेंसियों की मनमानी पर अंकुश लगा नहीं पा रही है वरना बुकिंग के बाद उसे एक सिलेंडर नसीब हो जाता।






