Lucknow City

सम्मान के लिए संघर्ष बना आंदोलन : मलिहाबाद में कौशल किशोर का शक्ति प्रदर्शन, सख्ती के बीच उमड़े समर्थक

प्रशासनिक अनुमति बिना हुई स्वाभिमान जनसभा में जुटी भीड़, सुरक्षा हटाने पर भड़के पूर्व केंद्रीय मंत्री, 13 सितंबर को नई रैली का ऐलान, पासी समाज के मुद्दे पर गरमाई प्रदेश की सियासत

प्रमोद कुमार

मलिहाबाद (लखनऊ), 20 मई 2026:

यूपी की राजधानी लखनऊ में महापुरुषों के सम्मान को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता कौशल किशोर के नेतृत्व में शुरू हुए संघर्ष ने एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया है। लखनऊ के मलिहाबाद में कौशल किशोर द्वारा आयोजित स्वाभिमान जनसभा एक सामाजिक आयोजन के साथ बड़ा शक्ति प्रदर्शन बनकर उभरी। प्रशासनिक अनुमति न मिलने और भारी पुलिस बंदोबस्त के बावजूद हजारों की संख्या में लोग भीषण गर्मी में सभा स्थल पहुंचे।

सभा के मंच से कौशल किशोर ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी सुरक्षा जानबूझकर हटाई गई है और प्रशासन उन्हें दबाने की कोशिश कर रहा है। अपने तीखे अंदाज में उन्होंने कहा कि मैं 15 बार चुनाव लड़ चुका हूं, जिसमें 3 बार जीता और 12 बार हारा हूं। मुझे चुनाव की चिंता नहीं है। मैं समाज के महापुरुषों और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहा हूं।

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सभा के दौरान उन्होंने 13 सितंबर को एक और विशाल ‘आत्मसम्मान रैली’ आयोजित करने का ऐलान कर दिया। इस घोषणा को आने वाले पंचायत और विधानसभा चुनावों से पहले नए राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत माना जा रहा है।

सभा को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क था। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था और कई समर्थकों को हाउस अरेस्ट किए जाने की चर्चाएं भी रहीं। इन तमाम सख्तियों के बावजूद उमड़ी भीड़ ने कौशल किशोर की जमीनी पकड़ का साफ संकेत दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे सीधे तौर पर शासन और प्रशासन के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

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दरअसल पूरे विवाद की जड़ मलिहापासी स्मृति द्वार को हटाया जाना है। कुछ दिन पहले प्रशासन ने इस स्मृति द्वार को हटाया था जिसके बाद पासी समाज में भारी नाराजगी फैल गई। विरोध इतना बढ़ा कि मलिहाबाद विधायक जय देवी कौशल और कौशल किशोर पांच दिनों तक धरने और प्रवास पर बैठे रहे। लगातार दबाव और आंदोलन के बाद प्रशासन को स्मृति द्वार दोबारा स्थापित करना पड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक स्मृति द्वार तक सीमित नहीं है बल्कि दलित और पासी समाज में बढ़ती राजनीतिक चेतना और सम्मान की राजनीति का संकेत है। जिस तरह प्रशासनिक दबाव के बावजूद भीड़ उमड़ी, उसने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष भी अब इस मुद्दे को सरकार की प्रशासनिक सख्ती और सामाजिक असंतोष से जोड़कर देख रहा है। अब निगाहें 13 सितंबर की प्रस्तावित रैली पर टिकी हैं। यह आने वाले दिनों में राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकती है।

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