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योगी सरकार का बड़ा आयुष दांव, UP में पढ़ाई जाएगी 2500 साल पुरानी सोवा रिग्पा

दक्षिण भारत में प्रचलित सिद्ध चिकित्सा पद्धति को भी मिलेगा विस्तार, परंपरागत चिकित्सा को मुख्यधारा में लाने की तैयारी, वाराणसी बनेगा सोवा रिग्पा का रिसर्च हब

लखनऊ, 30 अप्रैल 2026:

यूपी सरकार आयुष क्षेत्र में बड़ा कदम उठाने जा रही है। प्रदेश के आयुष कॉलेजों में जल्द ही 2500 वर्ष पुरानी पारंपरिक चिकित्सा पद्धति ‘सोवा रिग्पा’ (अमची चिकित्सा) और दक्षिण भारत में प्रचलित सिद्ध चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ ही प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को भी व्यापक बनाना है।

सरकार का लक्ष्य आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी के साथ-साथ सोवा रिग्पा को भी मुख्यधारा में शामिल करना है। यह पद्धतियां खासतौर पर कैंसर, जोड़ों के दर्द, मानसिक रोगों और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों में आधुनिक चिकित्सा के साथ पूरक इलाज के रूप में कारगर मानी जाती हैं।

प्रदेश के प्रमुख सचिव आयुष रंजन कुमार के अनुसार सोवा रिग्पा और सिद्ध पद्धति के डिग्री कोर्स शुरू करने की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है। इसके लिए आवश्यक मानकों, पाठ्यक्रम और बुनियादी ढांचे को विकसित किया जा रहा है। सरकार ने इस परियोजना को मंजूरी दे दी है और जल्द ही चयनित आयुष कॉलेजों में इन कोर्सों की शुरुआत होगी। डिग्री पूरी करने के बाद चिकित्सकों का पंजीकरण किया जाएगा जिससे वे अधिकृत रूप से अपने क्लीनिक खोल सकेंगे।

इस पहल के तहत वाराणसी में सोवा रिग्पा का एक प्रमुख केंद्र स्थापित किया जाएगा। यह केंद्र शोध, प्रशिक्षण और उपचार का हब बनेगा। इसमें जटिल बीमारियों पर विशेष फोकस किया जाएगा। वाराणसी को इसलिए चुना गया है क्योंकि यह पहले से ही आयुर्वेद और आध्यात्मिक चिकित्सा का प्रमुख केंद्र रहा है।

हिमालयी क्षेत्रों में प्रचलित सोवा रिग्पा की उत्पत्ति तिब्बत में मानी जाती है। यह शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन पर आधारित प्रणाली है। इसमें जड़ी-बूटियों, खनिजों और प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से उपचार किया जाता है। यह विशेष रूप से गठिया, पाचन विकार, मानसिक तनाव और त्वचा रोगों में प्रभावी मानी जाती है।

सिद्ध पद्धति शरीर के तीन दोष वात, पित्त और कफ के संतुलन पर आधारित है। इसमें औषधियों के साथ जीवनशैली और आहार पर भी विशेष जोर दिया जाता है। सरकार की इस पहल से पारंपरिक चिकित्सा को मजबूती मिलने के साथ युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और बेहतर होगी।

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