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जापानियों को अब नहीं मिलेगा भारतीय आम का स्वाद…जानिए इसके पीछे क्या है विवाद

आम की गुणवत्ता को लेकर जापान ने लगाई आयात पर रोक, 20 साल पहले भी लगा था ऐसा प्रतिबंध

न्यूज डेस्क, 31 मई 2026:

भारतीय आम की मिठास पर पूरी दुनिया फिदा है। लखनऊ की मशहूर दशहरी आम की खुशबू विदेशों तक पहचान रखती है और अल्फांसो, केसर और बंगनपल्ली को विदेशी बाजारों में ‘रॉयल फ्रूट’ कहा जाता है। लेकिन आज उसी भारतीय आम पर जापान ने 20 साल बाद फिर ताला लगा दिया है। जापान ने साफ कहा है कि भारतीय आम अब उसके बाजार में नहीं बिकेंगे क्योंकि कीट नियंत्रण प्रक्रिया में गंभीर खामियां मिली हैं। इस फैसले ने लखनऊ और मलिहाबाद के दशहरी उत्पादक किसानों से लेकर बड़े निर्यातकों तक सबकी चिंता बढ़ा दी है।

कीट नियंत्रण प्रक्रिया में गंभीर कमियां

भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश है। हर साल यहां करीब 2.8 करोड़ मीट्रिक टन आम पैदा होता है। अल्फांसो, केसर, लंगड़ा, दशहरी और बंगनपल्ली जैसी भारतीय किस्मों की विदेशों में भारी मांग रहती है। खासकर जापान जैसे देशों में भारतीय आम प्रीमियम कीमतों पर बिकते हैं। जापानी अधिकारियों का कहना है कि भारत की कीट नियंत्रण प्रक्रिया में गंभीर कमियां मिली हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित वेपर हीट ट्रीटमेंट यानी (वीएचटी) सेंटर का निरीक्षण किया गया था। इसी निरीक्षण के दौरान जापानी टीम को धूम्रीकरण और कीटाणुशोधन प्रक्रिया में गड़बड़ी मिली।

क्या होती है ‘वीएचटी’ प्रक्रिया

दरअसल विदेश भेजे जाने वाले आमों को एक खास नियंत्रित गर्म और नम हवा वाली प्रक्रिया से गुजारा जाता है ताकि उनमें मौजूद कीड़े, लार्वा और फल मक्खियां खत्म हो जाएं। यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियमों के तहत बेहद जरूरी मानी जाती है। लेकिन जापानी अधिकारियों का कहना है कि इस बार निरीक्षण के दौरान उन्हें कई तकनीकी खामियां मिलीं। इसके बाद जापान की योकोहामा प्लांट प्रोटेक्शन एसोसिएशन ने घोषणा कर दी कि 25 मार्च 2026 के बाद जारी किए गए निरीक्षण प्रमाणपत्र वाले भारतीय आम अब स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

‘फ्रूट फ्लाई’ के मामले में जीरो टॉलरेंस नीति

जापान कृषि सुरक्षा को लेकर दुनिया के सबसे सख्त देशों में गिना जाता है। वहां फल मक्खी यानी फ्रूट फ्लाई के मामले में जीरो टॉलरेंस नीति लागू है। फ्रूट फ्लाई एक छोटा लेकिन बेहद खतरनाक कीट माना जाता है। यह फलों के अंदर अंडे देता है और उसके लार्वा फल को अंदर से सड़ा देते हैं। आम, अमरूद, तरबूज, करेला और लौकी जैसी फसलें इससे बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि जापान किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं है।

करीब 20 साल पहले भी जापान ने भारतीय आमों पर इसी तरह का प्रतिबंध लगाया था। तब भी वजह फल मक्खी का खतरा था। बाद में भारत ने अपनी ट्रीटमेंट प्रक्रिया में सुधार किया और 2006 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। लेकिन अब एक बार फिर वही सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या भारत की गुणवत्ता जांच प्रणाली कमजोर पड़ रही है।

Indian Mango Export Dispute Farmers Face Losses (1)

निर्यातकों और किसानों को हो रहा नुकसान

हालांकि जापान भारतीय आमों का सबसे बड़ा खरीदार नहीं है लेकिन वहां भारतीय आमों की बहुत ऊंची और प्रीमियम कीमतें मिलती हैं। यह प्रतिबंध अप्रैल-जून के पीक एक्सपोर्ट सीजन के दौरान आया है जिससे निर्यातकों और किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। हालांकि, यूएई और खाड़ी देशों जैसे भारत के सबसे बड़े बाजारों में नियम इतने सख्त नहीं हैं इसलिए वहां निर्यात जारी रहेगा। जब तक भारतीय अधिकारी वीएचटी व्यवस्था में सुधार कर जापानी मानकों को पूरी तरह संतुष्ट नहीं करते तब तक जापान में भारतीय आमों का प्रवेश बंद रहेगा।

अब हालत यह है कि महाराष्ट्र के अल्फांसो आम की खेती करने वाले किसान पहले ही मौसम की मार झेल रहे हैं। अत्यधिक गर्मी के असर से कई इलाकों में फसल को भारी नुकसान हुआ है। कुछ सर्वेक्षणों में 85 से 90 प्रतिशत तक नुकसान का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में उत्पादन कम होने के बीच जापान का यह प्रतिबंध किसानों की परेशानी और बढ़ा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की छवि का मुद्दा

अब सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं दूसरे देश भी भारतीय कृषि उत्पादों को लेकर सख्ती न बढ़ा दें क्योंकि जब जापान जैसा देश किसी उत्पाद पर सवाल उठाता है तो बाकी देश भी अलर्ट हो जाते हैं। अगर अमेरिका, यूरोप या खाड़ी देशों ने भी जांच प्रक्रिया सख्त कर दी तो इसका असर सिर्फ आम पर नहीं बल्कि भारत के पूरे कृषि निर्यात पर पड़ सकता है।

यह मामला सिर्फ एक फल का नहीं है। यह भारत की कृषि विश्वसनीयता का सवाल है। यह किसानों की मेहनत, निर्यातकों के भरोसे और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की छवि का मुद्दा है। अगर भारत को दुनिया का कृषि सुपरपावर बनना है तो सिर्फ उत्पादन बढ़ाना काफी नहीं होगा। गुणवत्ता, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

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