सौरभ श्रीवास्तव
बक्शी का तालाब ( लखनऊ), 27 जनवरी 2026:
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए बिल को लेकर देशभर में सवर्ण समाज का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस नाराजगी का बड़ा प्रदर्शन देखने को मिला, जहां लखनऊ विश्वविद्यालय में हजारों छात्रों ने सड़क पर उतरकर बिल का विरोध किया। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि सरकार एक वर्ग को साधने के प्रयास में दूसरे वर्ग के भविष्य को जोखिम में डाल रही है। सवर्ण समाज का आरोप है कि यह बिल सामान्य वर्ग को अपराधी की तरह पेश करता है।
बीजेपी पदाधिकारियों ने दिए इस्तीफे
UGC बिल के विरोध में अब सियासी हलकों में भी हलचल मच गई है। लखनऊ में बीजेपी कुम्हरावां मंडल के महामंत्री अंकित तिवारी ने कई पदाधिकारियों के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि यह बिल उनके बच्चों के भविष्य पर बुरा असर डालेगा। उनका आरोप है कि सामान्य वर्ग को लगातार कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, जिससे समाज में असंतोष बढ़ रहा है। उन्होंने सरकार से इस बिल पर दोबारा विचार करने की मांग की।

क्या है UGC का नया नियम?
UGC ने 13 जनवरी 2026 को नया नियम लागू किया है, जिसका उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में SC, ST और OBC छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना है। इसके तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में इक्वल अपॉर्च्यूनिटी सेंटर (EOC) बनाना अनिवार्य होगा। EOC के तहत इक्विटी कमेटी गठित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान प्रमुख करेंगे। कमेटी को शिकायत पर 24 घंटे में कार्रवाई शुरू करनी होगी और 15 दिन में रिपोर्ट देनी होगी। नियमों का पालन न करने पर UGC मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकती है।
इस्तीफों की कड़ी, प्रशासन तक पहुंचा मामला
यह विवाद अब प्रशासनिक स्तर तक पहुंच चुका है। पहले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दिया और अब अयोध्या में तैनात GST डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में उठाने की बात कही। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल उन्हें स्वीकार नहीं है।
सियासत और समाज के बीच उलझता बिल
UGC का यह बिल जहां सरकार के अनुसार समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में कदम है, वहीं सवर्ण समाज इसे अपने अधिकारों और भविष्य के खिलाफ मान रहा है। छात्रों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक विरोध का दायरा बढ़ने से यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा राजनीतिक रूप ले सकता है।






