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बीन, सारंगी और मंजीरे फिर बोले… UP में जनजातीय वाद्यों को मिल रहा नया मंच

लुप्त होती धुनों को नई पहचान दे रहा लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान, देश व प्रदेश की जनजातियों के 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का किया जा रहा संरक्षण

लखनऊ, 29 जनवरी 2026:

यूपी के जंगलों, पहाड़ों और नदियों के किनारों पर कभी गूंजने वाली जनजातीय वाद्य यंत्रों की मधुर धुनें समय के साथ धीमी पड़ती जा रही थीं। डिजिटल दौर में बदलती जीवनशैली और आधुनिक संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच कई पारंपरिक वाद्य यंत्र विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। ऐसे समय में प्रदेश का लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान इन गुम होती धुनों को फिर से जीवंत करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

जनजातीय सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने के उद्देश्य से संस्थान देश और प्रदेश की विभिन्न जनजातियों के 200 से अधिक लुप्तप्राय वाद्य यंत्रों का संरक्षण कर रहा है। संस्थान द्वारा समय-समय पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनियां आयोजित की जा रही हैं। उनके माध्यम से न केवल इन वाद्यों को सुरक्षित किया जा रहा है बल्कि उन्हें बजाने वाले जनजातीय कलाकारों को भी सम्मानजनक मंच मिल रहा है।

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उत्तर प्रदेश की गोंड, थारू, बुक्सा, खरवार, सहरिया, बैगा, अगरिया, चेरो और माहीगीर जैसी जनजातियों के लोकजीवन में संगीत की विशेष भूमिका रही है। मंजीरा, चिमटा, खड़ताल और घुंघरुओं की खनक, बीन और सारंगी की सुरमयी धुनें इन समुदायों की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही हैं। आज जब ये वाद्य यंत्र धीरे-धीरे जनजीवन से दूर हो रहे हैं तब संस्थान का यह प्रयास सांस्कृतिक संरक्षण की एक सशक्त मिसाल बनकर उभर रहा है।

संस्थान द्वारा ढोलक, नगाड़ा, डफ, ढफली, डमरू, ढक और थाली जैसे प्राचीन ताल वाद्य यंत्रों के साथ-साथ सुर वाद्यों में बांसुरी, बीन और सारंगी तथा लय वाद्यों में मंजीरा, चिमटा, घुंघरू और खड़ताल को संरक्षित किया जा रहा है। बीते वर्ष प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान कला कुंभ में इन वाद्य यंत्रों की प्रदर्शनी को देश-विदेश से आए कला प्रेमियों और पर्यटकों ने खूब सराहा। यूपी दिवस के अवसर पर कला गांव में लगी प्रदर्शनी ने युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर दिया।

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जनजातीय गौरव बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर आयोजित जनजातीय भागीदारी महोत्सव में जब इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई दी तो यह साफ हो गया कि ये प्रयास केवल संरक्षण तक सीमित नहीं हैं बल्कि एक खोती हुई विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम भी हैं। लोक एवं जनजातीय संस्कृति संस्थान की यह पहल यह संदेश देती है कि परंपरा और आधुनिकता के संतुलन से ही सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा जा सकता है।

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