न्यूज डेस्क, 18 मई, 2026:
क्या आपको लगता है कि मैं किसी भी लायक नहीं हूं या छोटी-छोटी चीजों को लेकर खुद को दोषारोपण करते रहते हैं? अगर ऐसा है तो आप ‘इंपोस्टर सिंड्रोम से ग्रसित हो सकते हैं। ये एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहां व्यक्ति अपनी कड़ी मेहनत और सफलताओं को स्वीकार नहीं कर पाता। अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि कि ये कोई बीमारी नहीं है बल्कि मानसिक अवस्था है जिसे काउंसलिंग द्वारा सही मार्गदर्शन एवं स्व-मूल्यांकन की आदत डालकर दूर किया जा सकता है।
कैसे शुरुआत हुई इंपोस्टर सिंड्रोम की
दरअसल सबसे पहले 1978 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. पॉलीन क्लैंस और सुज़ैन इमेस ने इसकी जानकारी लोगों को दी। इसके लिए उन्होंने कई लोगों से बातें की और सर्वे कराया। उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि अत्यधिक उच्च उपलब्धि हासिल करने वाले (विशेष रूप से महिलाएं) लोग खुद को अयोग्य मानते हैं और उन्हें डर रहता है कि एक दिन उनकी सच्चाई सबके सामने आ जाएगी। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा भारत के कॉलेजों और मेडिकल छात्रों पर किए गए हालिया सर्वेक्षणों में पाया गया है कि लगभग 52% से 56% छात्रों में ये सिंड्रोम मौजूद है।

अचानक नहीं होता है ये सिंड्रोम
प्रमुख वैज्ञानिक कारक शोध बताते हैं कि यह सिंड्रोम अचानक नहीं होता बल्कि इसके पीछे कुछ विशिष्ट कारण और लक्षण होते हैं। इम्पोस्टर सिंड्रोम से ग्रस्त लोग हर काम में असंभव स्तर के लक्ष्य तय करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में इम्पोस्टर सिंड्रोम चिंता, अवसाद के बीच एक मजबूत संबंध है।अकादमिक जगत, वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा (मेडिकल) क्षेत्रों में इसका स्तर काफी अधिक देखा गया है क्योंकि यहां उच्च दबाव और प्रतिस्पर्धा का माहौल होता है। हर समय दूसरों को खुश करने की कोशिश, काम को टालते रहनी की आदत इस सिंड्रोम के खास लक्षण हैं।
मानसिक स्वास्थ्य के अभ्यास भी है बेहद जरूरी
विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे शरीर को फिट रखने के लिए रोज एक्सरसाइज जरूरी होती है वैसे ही दिमाग को मजबूत रखने के लिए रोज मानसिक अभ्यास की जरूरत होती है। अपनी खूबियों को पहचानना, छोटी-छोटी सफलताओं को स्वीकार करना और खुद को लगातार दोष देने की आदत छोड़ना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। इम्पोस्टर सिंड्रोम कोई कमजोरी नहीं बल्कि एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिससे सही सोच और अभ्यास के जरिए बाहर निकला जा सकता है। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि इंसान खुद को दूसरों की नजरों से नहीं बल्कि अपनी वास्तविक मेहनत, काबिलियत के आधार पर देखना शुरू करे।






