लखनऊ/वाराणसी, 16 फरवरी 2026:
यूपी के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के पालि एवं बौद्ध अध्ययन विभाग की ओर से 17 से 19 फरवरी तक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य पालि साहित्य, बौद्ध दर्शन, त्रिपिटक अध्ययन, विभिन्न बौद्ध परंपराओं की तुलनात्मक समीक्षा, बौद्ध संस्कृति-विरासत, पांडुलिपि विज्ञान और समकालीन संदर्भों में बौद्ध विचारों की प्रासंगिकता जैसे विषयों पर गहन विमर्श को आगे बढ़ाना है। तीन दिनों में कुल 80 चयनित शोध पत्र प्रस्तुत होंगे, जिनमें एशिया के कई देशों से आए विद्वान हिस्सा लेंगे।
म्यांमार, कोरिया, श्रीलंका, नेपाल, कंबोडिया, जापान, थाईलैंड और वियतनाम के शोधकर्ता अलग-अलग तकनीकी सत्रों में पालि त्रिपिटक, अट्ठकथा परंपरा, बौद्ध तर्कशास्त्र, थेरवाद और महायान दर्शन, तुलनात्मक बौद्ध अध्ययन तथा अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संवाद जैसे विषयों पर अपने निष्कर्ष साझा करेंगे। उद्घाटन सत्र में नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह मुख्य अतिथि होंगे, जबकि अध्यक्षता International Buddhist Confederation के अध्यक्ष प्रो. रवींद्र पंथ करेंगे। संरक्षिका के रूप में सुश्री सुषमा घिल्दियाल मौजूद रहेंगी। विशिष्ट अतिथि के तौर पर Toyo University के प्रो. केंजी ताकाहाशी अपने विचार रखेंगे।
19 फरवरी को समापन सत्र की अध्यक्षता नव नालंदा महाविहार के पूर्व निदेशक प्रो. उमा शंकर व्यास करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में केन्द्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान के कुलपति प्रो. राजेश रंजन उपस्थित रहेंगे। विशिष्ट अतिथियों में Hokkaido University के डॉ. तोमोयोकी यामाहाता और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान से जुड़े डॉ. के. सिरी सुमेध थेरो शामिल होंगे। समापन सत्र में सम्मेलन की संस्तुतियाँ प्रस्तुत होंगी और भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध शोध-सहयोग को मजबूत करने की रूपरेखा घोषित की जाएगी।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के मुताबिक यह आयोजन भारत और एशिया के देशों के बीच बौद्ध शिक्षा, पर्यटन, संस्कृति और शोध के रिश्तों को नई मजबूती देगा, जिससे भारत को वैश्विक बौद्ध ज्ञान-केन्द्र के रूप में पहचान मिलेगी। पालि को भारत की प्राचीनतम ज्ञात भाषाओं में माना जाता है। इसका साक्ष्य सम्राट Ashoka के शिलालेखों और स्तंभों में मिलता है। परंपरा के अनुसार भगवान Gautama Buddha ने अपने उपदेश पालि में दिए जो उस समय जनभाषा थी। केंद्र सरकार द्वारा पालि को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने से इसके संरक्षण और अकादमिक अध्ययन को नई गति मिली है।






