गोरखपुर, 6 जनवरी 2026:
मकर संक्रांति के मौके पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला सिर्फ आस्था का पर्व नहीं, बल्कि मनोरंजन और रोज़गार का बड़ा जरिया भी है। मकर संक्रांति से पहले शुरू होकर एक महीने से ज्यादा चलने वाला यह मेला हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है।
सूर्य के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा पूरी तरह लोक आस्था से जुड़ी हुई है। इस साल खिचड़ी पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। गोरखनाथ मंदिर में चढ़ाई जाने वाली खिचड़ी और अनाज साल भर जरूरतमंदों में बांटा जाता है। मंदिर का अन्न क्षेत्र इस बात का गवाह है कि यहां कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह कभी खाली नहीं जाती।
त्रेतायुग से जुड़ी है खिचड़ी की परंपरा
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेतायुगीन मानी जाती है। कथा के मुताबिक, आदियोगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में मां ज्वाला देवी के दरबार पहुंचे। मां ने उनके भोजन की व्यवस्था की, लेकिन बाबा ने कहा कि वे योगी हैं और भिक्षा में मिले अन्न को ही भोजन रूप में ग्रहण करते हैं। इसके बाद वे भिक्षाटन करते हुए गोरखपुर पहुंचे और राप्ती व रोहिणी नदी के किनारे साधना में लीन हो गए। लोग उनके खप्पर में चावल और दाल अर्पित करते रहे। मकर संक्रांति के दिन यही अन्न खिचड़ी के रूप में पकाया गया और तब से यह परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में चल पड़ी। लोक मान्यता है कि ज्वाला देवी के दरबार में आज भी बाबा की खिचड़ी के लिए पानी उबल रहा है।
लाखों श्रद्धालु होते हैं शामिल
मकर संक्रांति के दिन नाथ पंथ की परंपरा के अनुसार गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर जनकल्याण की कामना की जाती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, देश के कई हिस्सों और पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा को खिचड़ी अर्पित करने आते हैं। भोर में सबसे पहले गोरक्षपीठ की ओर से योगी आदित्यनाथ बाबा को खिचड़ी का भोग लगाते हैं। इसके बाद नेपाल राजपरिवार की ओर से लाई गई खिचड़ी चढ़ाई जाती है। फिर मंदिर के कपाट खुलते हैं और आम श्रद्धालुओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।
मेला परिसर पूरी तरह तैयार
खिचड़ी महापर्व को लेकर मंदिर और मेला परिसर को भली-भांति सजाया गया है। श्रद्धालुओं के ठहरने, खाने-पीने और अन्य सुविधाओं के पूरे इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन और मंदिर प्रबंधन लगातार तैयारियों पर नजर रखे हुए है। योगी आदित्यनाथ अब तक तीन बार खुद तैयारियों की समीक्षा कर चुके हैं।
सामाजिक समरसता की मिसाल
गोरखनाथ मंदिर सामाजिक एकता की मिसाल भी है। यहां जाति, पंथ और मजहब की दीवारें खुद-ब-खुद गिरती नजर आती हैं। मंदिर परिसर में हर समुदाय के लोगों की दुकानें हैं और सबकी रोज़ी-रोटी का इंतजाम बिना किसी भेदभाव के होता है। खिचड़ी मेला हजारों लोगों के लिए रोजगार का जरिया बनता है। मेले में दुकान लगाने वालों से लेकर रोज़मर्रा के काम करने वालों में बड़ी तादाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की होती है। उनका कहना है कि यहां कभी किसी तरह का फर्क महसूस नहीं हुआ, बल्कि हमेशा अपनापन ही मिला। यही वजह है कि गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला सिर्फ आस्था का नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और साझा संस्कृति का भी बड़ा प्रतीक बन चुका है।





