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भारत के इस वैज्ञानिक को नहीं मिला एक अनोखी खोज का क्रेडिट! जानिए उनकी पूरी कहानी…

जगदीश चंद्र बोस ने साबित किया कि पेड़-पौधों को भी दर्द होता है और जीवन अनुभव होता है। रेडियो और तरंगों की खोज करने वाले यह वैज्ञानिक आज भी मानवता और विज्ञान में प्रेरणा हैं

लखनऊ, 23 नवंबर 2025 :

पुण्यतिथि पर विशेष

अगर आपको पेड़-पौधों से प्यार है, तो उन्हें तोड़ते भी नहीं होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेड़ों को भी दर्द होता है? यह खोज भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने की थी। उन्होंने दिखाया कि पेड़-पौधे भी हमारी तरह संवेदनशील होते हैं और जीवन का अनुभव करते हैं। 23 नवंबर 1937 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके काम की वजह से उन्हें आज भी महान वैज्ञानिक माना जाता है। उनकी आज पुण्यतिथि है। उन्हें ‘फादर और रेडियो साइंस’ के नाम से भी जाना जाता है।

शुरुआती जीवन और शिक्षा

जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30 नवंबर, 1858 को ढाका के मैमनसिंह (जो अब बांग्लादेश में है) नामक गांव में एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता अंग्रेजों की नौकरी करते थे और चाहते थे कि जगदीश भी सरकारी नौकरी करें। लेकिन उन्होंने विज्ञान की पढ़ाई करने का फैसला किया। प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए वे लंदन गए। वहां चिकित्सा की पढ़ाई शुरू की, लेकिन अस्वस्थ होने के कारण भारत लौटना पड़ा। इसके बाद उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक का पद मिला।

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विज्ञान और मानवता के सच्चे साथी

जगदीश चंद्र बोस भारतीय विज्ञान के उन महान नामों में से हैं, जिनकी खोज आज भी सबको चौंकाती है। भारत लौटकर उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में भौतिकी के प्रोफेसर के तौर पर काम किया। लेकिन उस वक्त अंग्रेजों का नजरिया अलग था। उन्हें यूरोपीय प्रोफेसरों के मुकाबले सिर्फ दो तिहाई वेतन दिया जाता था। कई बार नस्लीय टिप्पणियों का सामना भी करना पड़ा। बोस ने यह सब सहन किया, लेकिन जब जरूरत पड़ी तो उन्होंने साल भर तक वेतन लेने से मना कर दिया। नतीजा, आर्थिक तंगी में उन्हें शहर से दूर जाना पड़ा। लेकिन अंततः अंग्रेजों और कॉलेज प्रशासन को झुकना पड़ा और उन्हें बराबर वेतन मिला।

क्यों नहीं मिला एक अनोखी खोज का क्रेडिट?

उन्होंने रेडियों की तरंगों को खोजा था। अपनी यह खोज कॉलेज के एक छोटे से कमरे में की, जहां न तो प्रयोगशाला थी और न ही उपकरण। उन्होंने तरंगों की विशेषताओं का अध्ययन करना शुरू किया। उनकी खोज को शुरू में गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने पेटेंट भी नहीं कराया। दो साल बाद इटली के वैज्ञानिक मारकोनी ने इसी खोज पर पेटेंट कराया और 1909 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी जीत लिया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने पेटेंट क्यों नहीं कराया, बोस ने कहा कि उनका काम मानवता की भलाई के लिए था और अविष्कार का व्यक्तिगत लाभ नहीं लेना चाहिए।

‘पौधों में भी है जीवन’ को किया साबित

बोस ने यह साबित किया कि पौधों में भी जीवन और संवेदनशीलता होती है। उन्हें दर्द महसूस होता है और तापमान, रोशनी से उनका जीवन प्रभावित होता है। विज्ञान के क्षेत्र में कई दिलचस्प खोज करने के लिए उन्हें 1917 में नाइट की उपाधि मिली। जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान को अपनी पूरी जिंदगी समर्पित की और 79 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनकी खोज और योगदान आज भी भारतीय और विश्व विज्ञान जगत में प्रेरणा बनकर जीवित हैं।

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