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जन्मदिन विशेष: हिट फिल्मों के पीछे थी इनकी कलम, जानिए कैसे बदली जावेद अख्तर ने हिंदी सिनेमा की भाषा

जावेद अख्तर आज अपने जन्मदिन पर हिंदी सिनेमा और साहित्य में दिए गए अपने अमूल्य योगदान के लिए याद किए जा रहे हैं। उनकी कलम ने गीतों और संवादों के जरिए न सिर्फ मनोरंजन किया, बल्कि समाज को सोचने की नई दिशा भी दी

मनोरंजन डेस्क, 17 जनवरी 2026:

हिंदी सिनेमा और साहित्य की दुनिया के उस बड़े नाम का आज जन्मदिन है, जिनके शब्द दिल को छूते हैं और सोच को झकझोर देते हैं। उर्दू के मशहूर शायर, हिंदी फिल्मों के गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर आज भी अपनी कलम के जरिए समाज को नई सोच देने का काम कर रहे हैं। उनके लिखे गीत और संवाद हर उम्र के लोगों से सीधे जुड़ते हैं।

जन्म और संघर्ष से भरा बचपन

जावेद अख्तर का जन्म आज ही के दिन 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था। उनका बचपन काफी उतार चढाव से भरा रहा। मां के निधन के बाद पिता जान निसार अख्तर ने दूसरी शादी की। इसके बाद जावेद कुछ समय तक अपने नाना नानी के पास लखनऊ में रहे और फिर अलीगढ जाकर अपनी खाला के साथ रहते हुए शुरुआती पढ़ाई पूरी की।

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फिल्मी दुनिया में पहला कदम

जावेद अख्तर ने अपने करियर की शुरुआत फिल्म सरहरी लुटेरा से की। इस फिल्म में सलीम खान हीरो थे और जावेद अख्तर क्लैपर बॉय के रूप में काम कर रहे थे। यहीं से दोनों के बीच दोस्ती की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर हिंदी सिनेमा की सबसे मशहूर जोड़ियों में शामिल हो गई।

सलीम जावेद की ऐतिहासिक जोड़ी

साल 1971 से 1982 तक सलीम और जावेद ने करीब 24 फिल्मों में साथ काम किया। इस दौरान सीता और गीता, शोले, हाथी मेरा साथी, यादों की बारात और दीवार जैसी सुपरहिट फिल्में दर्शकों को मिलीं। साल 1987 में आई फिल्म मिस्टर इंडिया के बाद यह सुपरहिट जोड़ी अलग हो गई, लेकिन जावेद अख्तर का रचनात्मक सफर आगे बढ़ता रहा।

गीत, सम्मान और पहचान

जोड़ी टूटने के बाद भी जावेद अख्तर ने फिल्मों के लिए संवाद और गीत लिखना जारी रखा। उन्होंने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। उनके बेहतरीन काम के लिए उन्हें आठ बार फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। साहित्य और कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

आज भी उतनी ही सच्ची कलम

आज उनके जन्मदिन पर सिर्फ एक कलाकार को नहीं, बल्कि उस सोच को सलाम किया जा रहा है जो सवाल करना सिखाती है और सच के साथ खड़े रहना सिखाती है। जावेद अख्तर के लिए शब्द केवल लिखे नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं। उनकी कलम आज भी उतनी ही बेबाक, उतनी ही सच्ची और उतनी ही असरदार है। उम्मीद है कि उनकी लिखी शब्दों की रोशनी आने वाली पीढ़ियों को भी रास्ता दिखाती रहेगी।

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