लखनऊ, 26 जनवरी 2026:
नजाकत, नफासत और तहजीब के लिए मशहूर लखनऊ की पहचान को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। चिकित्सा और कला के क्षेत्र में दशकों तक किए गए उल्लेखनीय योगदान के लिए शहर की तीन प्रतिष्ठित हस्तियों को इस वर्ष पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। इन विभूतियों में केजीएमयू के पूर्व विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र प्रसाद, राजकीय आयुर्वेद कॉलेज टुडियागंज के पूर्व प्राचार्य डॉ. केवल कृष्ण ठकराल और जाने-माने रंगकर्मी, वैज्ञानिक व फिल्म अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी शामिल हैं। इस घोषणा से लखनऊवासियों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
टीबी के खिलाफ संघर्ष का पर्याय बने डॉ. राजेंद्र प्रसाद
पद्मश्री सम्मान के लिए चुने गए डॉ. राजेंद्र प्रसाद राजधानी के जाने-माने टीबी रोग विशेषज्ञ हैं। उन्होंने केजीएमयू में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के छात्र से लेकर विभागाध्यक्ष तक का लंबा और गौरवशाली सफर तय किया। उनके चयन की खबर मिलते ही केजीएमयू परिसर में उत्साह का माहौल बन गया।
वर्ष 1950 में बस्ती जिले के मुंडेरवा कस्बे में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्रारंभिक शिक्षा मुंडेरवा और खलीलाबाद से पूरी की। इंटरमीडिएट लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से करने के बाद 1970 में केजीएमयू से एमबीबीएस में प्रवेश लिया। यहीं से एमडी करने के बाद 1984 में शिक्षक के रूप में केजीएमयू से जुड़े और बाद में विभागाध्यक्ष बने। उन्होंने यह सम्मान अपने परिवार और केजीएमयू को समर्पित करते हुए इसे सामूहिक उपलब्धि बताया।

आयुर्वेद को नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले डॉ. केवल कृष्ण ठकराल
राजकीय आयुर्वेद कॉलेज टुडियागंज के पूर्व प्राचार्य डॉ. केवल कृष्ण ठकराल को भी पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया है। चिकित्सकों के परिवार में पले-बढ़े डॉ. ठकराल ने पिता और भाइयों की प्रेरणा से आयुर्वेद को जीवन का लक्ष्य बनाया। उन्होंने वर्ष 1964 में बीएएमएस में दाखिला लिया और लेक्चरर से लेकर प्राचार्य व निदेशक तक का सफर तय किया। वर्ष 1996 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका शैक्षणिक और शोध कार्य जारी रहा। उन्होंने 66 शोध पत्र प्रस्तुत किए, जिनमें से कई देश-विदेश की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। शल्य तंत्र और क्षार सूत्र चिकित्सा पर लिखी उनकी पुस्तकें आयुर्वेद जगत में मील का पत्थर मानी जाती हैं। इससे पहले उन्हें आयुर्वेद रत्नाकर, आयुर्वेद बृहस्पति और राष्ट्रीय हर्बल संरक्षण पुरस्कार जैसे कई सम्मान मिल चुके हैं।

सरलता और साधना के प्रतीक डॉ. अनिल रस्तोगी
83 वर्षीय डॉ. अनिल रस्तोगी का नाम लखनऊ के सांस्कृतिक परिदृश्य का पर्याय बन चुका है। सौ से अधिक नाटकों में अभिनय, हजार से ज्यादा मंचन, 75 से अधिक फिल्मों और दर्जनों वेब सीरीज व धारावाहिकों में अपनी छाप छोड़ने वाले डॉ. रस्तोगी ने कला और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में समान रूप से योगदान दिया।
सीडीआरआई में वैज्ञानिक रहने के साथ-साथ दर्पण नाट्य समूह से जुड़े डॉ. रस्तोगी को लखनऊ बेहद प्रिय है। शहर भी उन्हें उतना ही स्नेह देता है। पद्मश्री की घोषणा से शहरवासियों में उत्सव का माहौल है। इससे पहले उन्हें यश भारती, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और कई प्रतिष्ठित लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान मिल चुके हैं।

पद्मश्री सम्मान से सम्मानित ये तीनों विभूतियां न केवल लखनऊ बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा हैं। उनकी उपलब्धियों ने एक बार फिर साबित किया है कि लखनऊ केवल तहजीब का ही नहीं अपितु प्रतिभा और साधना का भी शहर है।






