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लखनऊ के रंगमंच से पद्मश्री तक… 98 नाटक और 75 फिल्में, जानिए डॉ. अनिल रस्तोगी का असाधारण सफर

लखनऊ के वरिष्ठ अभिनेता, रंगकर्मी और वैज्ञानिक डॉ. अनिल रस्तोगी को पद्मश्री 2026 से सम्मानित किया जाएगा। 98 से अधिक नाटकों, 1000+ मंचनों और 75 से ज्यादा फिल्मों के साथ उनका जीवन लखनऊ के लिए गर्व और प्रेरणा का प्रतीक है

लखनऊ, 26 जनवरी 2026:

विज्ञान की लैब से रंगमंच तक पुराने लखनऊ के डॉ. अनिल रस्तोगी की यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। सीडीआरआई में वर्षों तक वैज्ञानिक रह चुके डॉ. रस्तोगी ने कला और अभिनय की दुनिया में ऐसा मुकाम हासिल किया कि आज उनके 64 साल लंबे योगदान को पद्मश्री 2026 के लिए चुना गया है। आइए विस्तार से जानते हैं यहां तक कैसे पहुंचा इनका सफर …

लखनऊ में जन्म, यहीं से शुरू हुआ सफर

डॉ. अनिल रस्तोगी का जन्म 4 अप्रैल 1943 को लखनऊ में हुआ था। लखनऊ में रहकर ही उन्होंने अभिनय, रंगमंच, टेलीविजन, सिनेमा और विज्ञान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। वे न सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता हैं, बल्कि एक सफल वैज्ञानिक और शिक्षाविद भी रहे हैं। उनका जीवन जुनून, मेहनत और निरंतर समर्पण का उदाहरण है।

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पढ़ाई में भी अव्वल रहे डॉ. रस्तोगी

डॉ. रस्तोगी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई लखनऊ के प्रतिष्ठित संस्थानों से की। इसके बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उनकी रुचि विज्ञान में गहरी होती चली गई और उन्होंने सूक्ष्म जीव विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

सीडीआरआई से वैज्ञानिक सफर की शुरुआत

साल 1962 में डॉ. अनिल रस्तोगी ने लखनऊ के केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) में कनिष्ठ अनुसंधान अध्येता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने जैव रसायन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध किए और आगे चलकर बायोकेमेस्ट्री विभाग के प्रमुख बने। उनके शोध कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। वर्ष 2003 में वे सम्मान के साथ सेवानिवृत्त हुए।

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रंगमंच बना जीवन का सबसे बड़ा जुनून

विज्ञान के साथ-साथ रंगमंच डॉ. रस्तोगी का सबसे बड़ा प्यार रहा। 1962 में ही उनका जुड़ाव थिएटर से हुआ और फिर यह सिलसिला जीवन भर चलता रहा। उन्होंने 98 से अधिक नाटकों में अभिनय किया और 1000 से ज्यादा मंच प्रस्तुतियां दीं। उनके अभिनय की पहचान उसकी सादगी, गहराई और सच्चाई रही।

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ये नाटक बने पहचान

डॉ. रस्तोगी के कई नाटक आज भी दर्शकों को याद हैं।

पंची जा, पंची आ – 400 से अधिक मंचन, पवन की भूमिका में खूब सराहना

ताज महल का टेंडर- शाहजहां की भूमिका में हास्य और व्यंग्य

यहूदी की लड़की -यहूदी के रूप में प्रभावशाली अभिनय

कन्यादान – एक संवेदनशील पिता की भूमिका

सखाराम बाइंडर – नायक का दमदार और यादगार चित्रण

इसके अलावा द ओल्ड वर्ल्ड, बलराम की तीर्थ यात्रा और अंतिम वसंत जैसे नाटक भी शामिल हैं।

दर्पण थिएटर को दी नई पहचान

डॉ. अनिल रस्तोगी ने प्रसिद्ध थिएटर समूह दर्पण के सचिव के रूप में 46 वर्षों तक काम किया। उनके नेतृत्व में यह संस्था लखनऊ की सबसे प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्थाओं में गिनी जाने लगी।

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टीवी और वेब सीरीज में भी मजबूत मौजूदगी

थिएटर के बाद डॉ. रस्तोगी ने टेलीविजन और वेब सीरीज में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनके किरदार हमेशा सच्चे और जमीन से जुड़े नजर आए।

टीवी के यादगार किरदार

उड़ान (1989) – एसएसपी बशीर अहमद

ना बोले तुम ना मैंने कुछ कहा (सीजन 2) – पुरुषोत्तम सिंह तिलकधारी

रजिया सुल्तान – ऐतिहासिक किरदार

ताली (2023) और ग्रहण – गंभीर और असरदार भूमिकाएं

वेब सीरीज में भी छाए

आश्रम (2020) – सुंदर लाल की भूमिका

शिक्षा मंडल (2022) – उमेश महाजन

दरीबा डायरीज – ऐतिहासिक कहानी में दमदार अभिनय

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सिनेमा में 75 से ज्यादा फिल्में

डॉ. अनिल रस्तोगी ने 75 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया है। उनकी कुछ प्रमुख फिल्में-

इश्कजादे – परमा के दादा

थप्पड़ – जस्टिस जयसिंह

मुल्क – सोनकर

मुक्ति भवन – होटल प्रबंधक

रेड – वित्त मंत्री

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर – शिवराज पाटिल

मिशन रानीगंज (2024) – अहम भूमिका

इसके अलावा महादेव का गोरखपुर और बिक्रू कानपुर गैंगस्टर जैसी क्षेत्रीय फिल्मों में भी उनका काम सराहा गया।

सम्मानों से सजा शानदार करियर

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डॉ. अनिल रस्तोगी को अभिनय और विज्ञान दोनों क्षेत्रों में कई बड़े सम्मान मिले हैं-

राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2023)

यश भारती पुरस्कार (2017)

कालिदास सम्मान

पाटलिपुत्र लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (2024)

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज फेलोशिप (1999)

लखनऊ के लिए गर्व का पल

पद्मश्री 2026 डॉ. अनिल रस्तोगी के उस सफर को सम्मान देता है, जिसमें उन्होंने विज्ञान और कला दोनों को पूरी ईमानदारी से जिया। वे आज भी नई पीढ़ी के कलाकारों और वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा हैं। डॉ. अनिल रस्तोगी सिर्फ एक अभिनेता या वैज्ञानिक नहीं, बल्कि लखनऊ की सांस्कृतिक पहचान हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि मेहनत और जुनून से हर सीमा को पार किया जा सकता है।

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