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‘1857’ के विमर्श को नई आवाज देने वाले नहीं रहे वीरेंद्र यादव, शब्दों से समाज को आईना दिखाती थी इनकी लेखनी

हिंदी साहित्य के प्रख्यात समालोचक वीरेंद्र यादव का 76 वर्ष की उम्र में हृदय गति रुकने से निधन हो गया। 1857 के विमर्श और प्रेमचंद पर उनके लेखन को साहित्य जगत में विशेष महत्व दिया जाता है

लखनऊ, 16 जनवरी 2026:

हिंदी साहित्य के प्रख्यात समालोचक और प्रगतिशील लेखक संघ से लंबे समय तक जुड़े रहे वीरेंद्र यादव का आज सुबह हृदय गति रुकने से निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे और लखनऊ के इंदिरा नगर क्षेत्र में रहते थे। उनके निधन की खबर से साहित्य और बौद्धिक जगत में गहरा शोक फैल गया है।

जौनपुर से लखनऊ तक का सफर

वीरेंद्र यादव का जन्म वर्ष 1950 में जौनपुर जिले में हुआ था। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए किया। छात्र जीवन से ही वे वामपंथी विचारधारा से जुड़े रहे और बौद्धिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे कथा आलोचना के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे और अपने विचारों के लिए पहचाने जाते थे।

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प्रगतिशील लेखक संघ और संपादन में अहम भूमिका

वह उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के लंबे समय तक सचिव रहे और ‘प्रयोजन’ पत्रिका के संपादक के रूप में भी उनकी खास पहचान रही। वे युवा लेखकों के लेखों को गंभीरता से पढ़ते, सुझाव देते और उन्हें बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी आलोचना स्पष्ट और ईमानदार होती थी, लेकिन उसमें कभी कटुता नहीं रहती थी।

1857 और प्रेमचंद पर चर्चित लेखन

वीरेंद्र यादव ‘1857’ के विमर्श और प्रेमचंद से जुड़ी बहसों पर अपने हस्तक्षेपकारी लेखन के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। उन्होंने जान हर्सी की पुस्तक ‘हिरोशिमा’ का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद भी किया। उनके कई लेखों का अंग्रेजी और उर्दू में अनुवाद हुआ। आलोचना के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2001 में ‘देवीशंकर अवस्थी सम्मान’ से सम्मानित किया गया था।

सादा जीवन और गहरी सोच के मालिक

व्यक्तिगत जीवन में वे बेहद सादगीपूर्ण थे। किताबें, चाय और परिवार उनके जीवन का अहम हिस्सा थे। वे मानते थे कि साहित्य समाज के लिए है, लेकिन परिवार के बिना अधूरा है। उनके निधन को साहित्य जगत ने एक ऐसे विचारशील साथी के जाने के रूप में देखा है, जो हमेशा सच्चाई और संवेदना के साथ खड़ा रहा।

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