लखनऊ, 3 जनवरी 2026:
जब समाज ने रास्ते में कांटे बिछाए, तब भी उन्होंने किताब उठाई। गोबर और पत्थरों की मार सहकर भी लड़कियों को पढ़ाने निकलीं देश की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले, जिन्होंने शिक्षा को आंदोलन बना दिया। भारत में शिक्षा को समान अधिकार दिलाने की लड़ाई में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है। जिस दौर में लड़कियों और वंचित वर्ग को पढ़ने की इजाजत नहीं थी, उस समय सावित्रीबाई फुले ने समाज की रूढ़ियों को चुनौती देकर शिक्षा की अलख जगाई। उनके संघर्ष के बिना देश में महिला शिक्षा और सामाजिक बदलाव की कल्पना अधूरी है।
कम उम्र में विवाह, फिर शिक्षा की शुरुआत
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में हुआ था। महज 9 साल की उम्र में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से हुआ, जो उस समय 13 वर्ष के थे। विवाह के समय सावित्रीबाई पूरी तरह अनपढ़ थीं, जबकि ज्योतिराव तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। उस दौर में शिक्षा केवल उच्च जाति के पुरुषों तक सीमित थी। महिलाओं और दलितों को पढ़ने का अधिकार नहीं था, लेकिन ज्योतिराव फुले ने सावित्रीबाई को पढ़ाया और यहीं से समाज बदलने की नींव पड़ी।

समाज सुधार की राह पर ऐतिहासिक संघर्ष
सावित्रीबाई फुले ने 19वीं सदी में महिला अधिकारों, शिक्षा, छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने अंधविश्वास और रूढ़ियों को तोड़ने के लिए जीवन भर संघर्ष किया। उनका मानना था कि शिक्षा ही समाज को बराबरी और सम्मान की राह पर ले जा सकती है। वे केवल शिक्षिका ही नहीं, बल्कि एक मजबूत समाज सुधारक भी थीं।
बालिका शिक्षा की ऐतिहासिक शुरुआत
सावित्रीबाई फुले और ज्योतिराव फुले ने मिलकर लड़कियों की शिक्षा के लिए 18 स्कूलों की स्थापना की। वर्ष 1848 में पुणे में उन्होंने देश का पहला बालिका विद्यालय खोला। इसके बाद लगातार प्रयास कर 18वां स्कूल भी पुणे में ही शुरू किया गया। इतना ही नहीं, 28 जनवरी 1853 को उन्होंने गर्भवती बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना कर समाज को नई दिशा दी।
स्कूल जाते समय झेली हिंसा और अपमान
जब सावित्रीबाई फुले स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तब स्त्री शिक्षा के विरोधी उन पर गोबर फेंकते थे और पत्थर मारते थे। वह रोज अपने बैग में अतिरिक्त साड़ी रखती थीं, ताकि स्कूल पहुंचकर कपड़े बदल सकें। इन अपमानजनक हालातों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। सावित्रीबाई एक कवयित्री भी थीं और उन्हें मराठी की पहली कवयित्री के रूप में भी जाना जाता है।
सेवा करते हुए हुआ निधन, आज भी जीवित विचार
ज्योतिराव फुले के निधन के बाद सावित्रीबाई फुले ने उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। वर्ष 1897 में जब प्लेग फैला, तो वे मरीजों की सेवा में जुट गईं। इसी दौरान 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात कार्यक्रम में सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले के योगदान को याद करते हुए कहा था कि शिक्षा और मानवता के लिए उनका समर्पण आज भी देश को प्रेरणा देता है।






