न्यूज डेस्क, 11 मार्च 2026:
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसले में 32 वर्षीय हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए दिल्ली स्थित एम्स को निर्देश दिया कि हरीश राणा को तुरंत भर्ती किया जाए और उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
यह पहला मौका माना जा रहा है जब सर्वोच्च अदालत ने इस प्रकार के मामले में इतनी स्पष्टता के साथ इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मानवीय गरिमा संविधान के मूल सिद्धांतों में से एक है और जब किसी व्यक्ति का जीवन केवल कृत्रिम साधनों के सहारे ही चल रहा हो तथा चिकित्सा विज्ञान के अनुसार उसके ठीक होने की कोई संभावना न बची हो तब उसे मृत्यु चुनने का अधिकार दिया जा सकता है।

हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में थे। वे क्वाड्रिप्लेजिया यानी चारों अंगों के लकवे से ग्रस्त थे और पूरी तरह मशीनी जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर हैं। सांस लेने के लिए उनके शरीर में ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब लगी हुई थी जबकि भोजन के लिए गैस्ट्रोजेजुनोस्टॉमी ट्यूब के माध्यम से पोषण दिया जा रहा था।
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे। उसी दौरान वह एक पेइंग गेस्ट हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उन्हें गंभीर ब्रेन इंजरी हो गई थी। इलाज के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी लेकिन मस्तिष्क की गंभीर चोट के कारण वह लगातार वेजिटेटिव स्टेट में ही रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हरीश राणा कभी एक होनहार छात्र थे लेकिन हादसे के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और उनके ठीक होने की कोई संभावना भी नहीं है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ का मतलब मरीज को जीवन बचाने के लिए दिए जा रहे उपचार, दवाओं या लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाना या रोक देना होता है ताकि प्राकृतिक रूप से मृत्यु हो सके। यह ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ से अलग है, जिसमें किसी व्यक्ति को जानबूझकर दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु दी जाती है और जो भारत में अभी भी प्रतिबंधित है। इस फैसले को मानवीय गरिमा और जीवन के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण न्यायिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।






