Uttar Pradesh

‘द शैडो’ बनेगा बेटियों की सुरक्षा का डिजिटल प्रहरी, UPSIFS के छात्रों ने तैयार किया अनोखा एप

पैरेंट-फर्स्ट अप्रूवल से बेटियों की सुरक्षा को नई मजबूती, एसओएस इमरजेंसी सिस्टम से मिलेगी तुरंत मदद, रहेगी हर खतरे पर नजर, परछाईं की तरह करेगा बेटियों की सुरक्षा

लखनऊ, 22 मार्च 2026:

यूपी सरकार की बेटियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की सोच अब तकनीकी नवाचार के रूप में भी सामने आ रही है। इसी दिशा में यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंसेज (यूपीएसआईएफएस) ने एक अनूठी पहल करते हुए ‘द शैडो’ नामक एप विकसित किया है। यह छात्राओं की सुरक्षा और शैक्षणिक प्रबंधन को एक साथ मजबूत करने का काम करेगा।

संस्थान के डिप्टी डायरेक्टर चिरंजीव मुखर्जी के अनुसार इस एप को संस्थान के ही बीटेक छात्रों ने तैयार किया है। यह एप केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है बल्कि इसे एक समग्र सुरक्षा-आधारित डिजिटल इकोसिस्टम के रूप में डिजाइन किया गया है। यह हर छात्र के साथ उसकी परछाईं की तरह जुड़ा रहेगा।

‘द शैडो’ एप के जरिए कैंपस में प्रवेश और निकास, अवकाश अनुरोध सहित सभी गतिविधियों को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड किया जाता है। इससे प्रशासन को छात्रों की गतिविधियों की रियल-टाइम जानकारी मिलती रहती है। इसके साथ ही अटेंडेंस, असाइनमेंट, परीक्षा परिणाम और अकादमिक प्रगति का पूरा डेटा एक ही प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध रहता है, जिससे छात्र, अभिभावक और शिक्षक आपस में बेहतर तरीके से जुड़े रहते हैं।

इस एप की सबसे खास विशेषता ‘पैरेंट-फर्स्ट अप्रूवल सिस्टम’ है। इसके तहत किसी भी छात्रा को कैंपस से बाहर जाने के लिए सबसे पहले अभिभावकों की अनुमति आवश्यक होगी। इससे न केवल सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत जुड़ती है बल्कि अभिभावकों का विश्वास भी मजबूत होता है। छात्राओं की स्वतंत्रता व सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहता है।

एप में इंटीग्रेटेड एसओएस इमरजेंसी कॉल सिस्टम भी दिया गया है। किसी भी आपात स्थिति में छात्रा एक बटन दबाकर तुरंत प्रशासन और अभिभावकों को अलर्ट भेज सकती है। इससे समय रहते सहायता उपलब्ध कराई जा सके। इसके अलावा क्यूआर-कोड आधारित डिजिटल गेट पास सिस्टम कैंपस में अनधिकृत प्रवेश को रोकने में मदद करेगा।

असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नेहा सिंह के मार्गदर्शन में छात्र हर्ष और आदित्य मिश्रा द्वारा विकसित यह एप तकनीकी नवाचार का बेहतरीन उदाहरण है। ‘द शैडो’ सुरक्षा को सशक्त बनाने के साथ यह दिखाता है कि डिजिटल तकनीक के माध्यम से बेटियों को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।

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