न्यूज डेस्क, 4 जनवरी 2026:
बांग्लादेश में एक बार फिर हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। ढाका में कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद भड़के हिंसक प्रदर्शन, हिंदू युवक दीपचंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या, आगजनी, मीडिया संस्थानों पर हमले और खुलेआम भारत-विरोधी नारे इस बात के संकेत हैं कि देश में अशांति का दौर अभी थमा नहीं है। यह वही अशांति है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2024 में शेख हसीना सरकार के विरोध से हुई थी और जो अंतरिम सरकार के गठन के एक साल बाद भी जारी है। फिलहाल बांग्लादेश में निशाने पर आए हिंदू समाज को लेकर भारत मे गुस्सा और आक्रोश है। रैली-विरोध प्रदर्शन जारी है मांग की जा रही है हिंदूओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए वहीं सियासी दल भी सरकार को घेरते हुए उसकी रणनीति पर सवाल दाग रहे हैं।

शेख हसीना के बाद का बांग्लादेश
शेख हसीना के इस्तीफे के बाद बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि जल्द से जल्द निष्पक्ष चुनाव कराकर लोकतांत्रिक व्यवस्था बहाल की जाए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हालात लगातार बिगड़ते चले गए। छात्र आंदोलनों, राजनीतिक टकराव और प्रशासनिक कमजोरी के बीच इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ता गया। अवामी लीग का आरोप है कि बदली हुई परिस्थितियों ने कट्टरपंथी और जिहादी तत्वों को मुख्यधारा में आने का अवसर दे दिया है।
हिंसा की चिंगारी: शरीफ उस्मान हादी की मौत
कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के लिए भारत से आये लोगों को जिम्मेदार ठहराया गया। इसी के बाद ढाका समेत कई इलाकों में हिंसक प्रदर्शन भड़क उठे। इन प्रदर्शनों ने जल्द ही सांप्रदायिक और भारत-विरोधी रूप ले लिया। सरकारी संपत्तियों के साथ-साथ निजी प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाया गया। इस दौरान आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं।

हिंदू युवाओं की हत्या: डर का सबसे भयावह चेहरा
इसी अशांत माहौल में हिंदू समुदाय पर हमले तेज हो गए। सबसे चौंकाने वाला मामला मयमनसिंह जिले का रहा, जहां हिंदू युवक दीपचंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला। आरोप है कि हत्या के बाद उसके शव को पेड़ से बांधकर जला दिया गया। इसके बाद अमृत मंडल (सम्राट) की हत्या ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। राजबाड़ी जिले में भीड़ ने उसे घेरकर पीटा, जिससे उसकी मौत हो गई। इसके अलावा मयमनसिंह के भालुका क्षेत्र में एक और हिंदू युवक की गोली मारकर हत्या और बृजेंद्र बिस्वास की मौत की खबरों ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंसा किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है।

हत्याएं से सुनियोजित डर फैलाने का माहौल
हिंदू युवाओं की हत्याएं इस संकट का सबसे भयावह पहलू हैं, लेकिन इसके साथ मंदिरों पर हमले, घरों में तोड़फोड़, लूटपाट और धमकियों की घटनाएं भी सामने आई हैं। कई हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि प्रशासन की ढिलाई और समय पर कार्रवाई न होने से भीड़ का मनोबल बढ़ा है।
मीडिया पर हमले कर चौथे स्तंभ को दी चोट
हिंसा का दायरा यहीं नहीं रुका। बांग्लादेश के प्रमुख समाचारपत्रों ‘प्रोथोम आलो’ और ‘द डेली स्टार’ के कार्यालयों पर हमले किए गए। सांस्कृतिक संस्था ‘छायानट’ में भी तोड़फोड़ हुई। यह केवल मीडिया संस्थानों की सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को डराने और उदार सोच को दबाने का प्रयास माना जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि अंतरिम सरकार इन तत्वों पर लगाम लगाने में नाकाम रही है।

यूनुस सरकार पर सवाल
अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। क्या यह सरकार उनकी मजबूरी को दर्शाता है या फिर कट्टरपंथियों के प्रति नरम नीति का नतीजा है? आलोचकों का आरोप है कि यूनुस सरकार की नीतियों से जमात-ए-इस्लामी और उससे जुड़े छात्र संगठनों को अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिल रहा है, जिससे हिंसक प्रदर्शनकारियों के हौसले बुलंद हैं।
भारत-बांग्लादेश रिश्तों में बढ़ता तनाव
इन घटनाओं का सीधा असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर पड़ा है। हिंदू समुदाय पर हमले, भारत-विरोधी नारे और सीमा से जुड़े घटनाक्रमों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। बंगाल की खाड़ी में बांग्लादेशी नौसेना द्वारा भारतीय मछली पकड़ने वाली नाव से टक्कर और भारतीय जलक्षेत्र में बांग्लादेशी नौकाओं की बढ़ती संख्या जैसे मामलों ने तनाव को और गहरा किया है।

भू-राजनीतिक पहलू: पाकिस्तान और चीन की सक्रियता
बांग्लादेश में बढ़ती अस्थिरता का फायदा पाकिस्तान और चीन उठाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की सक्रियता और बांग्लादेश-पाकिस्तान नजदीकियों की चर्चा तेज हुई है। वहीं, शेख हसीना के इस्तीफे के बाद चीन के राजदूत की बीएनपी और जमात नेताओं से मुलाकात को भी रणनीतिक संकेत माना जा रहा है। अमेरिका की नजर भी बंगाल की खाड़ी के सेंट मार्टिन द्वीप पर बताई जा रही है।
केंद्र का दावा उसकी रणनीति संतुलित व संयमित लेकिन सियासी दल और संगठन हुए मुखर
भारत ने हालात के बावजूद संतुलित और परिपक्व रुख अपनाया है। ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के तहत भारत फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर चल रहा है। भारत जानता है कि बांग्लादेश में अस्थिरता का फायदा पाकिस्तान और चीन को मिल सकता है। इसलिए भारत का जोर शांति, लोकतंत्र की बहाली, हिंदुओं की सुरक्षा और द्विपक्षीय रिश्तों में स्थिरता पर है। इसके बावजूद बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते हमलों की ख़बरें भारत में सामाजिक और राजनीतिक संवेदनाओं को भड़का रही हैं। कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए, प्रदर्शनकारियों ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और पीड़ितों के लिए न्याय की मांग रखी। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे हमलों की निंदा करता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को उठाता रहेगा।

फिलहाल भारत में विरोध केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समूहों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी अल्पसंख्यक सुरक्षा और विदेश नीति में सक्रिय भूमिका की मांग की है। भारतीय विपक्षी पार्टियां और सामाजिक संगठन इस मुद्दे पर अभी तक कड़ी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, इनमें आरोप हैं कि पड़ोसी देश में मानवाधिकार की रक्षा नहीं हो रही है और भारत को अधिक मजबूत नीति अपनानी चाहिए। कुछ राजनैतिक समूहों ने प्रदर्शन और विरोध रैलियां भी आयोजित कीं और लगातार इस मुद्दे को धार दिए हुए हैं।






