न्यूज डेस्क, 28 मई, 2026:
आज के समय अगर पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं तो घर की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हो रही है लेकिन इसका सीधा असर बच्चों के साथ उनके जुड़ाव और रिश्तों पर पड़ रहा है। ऑफिस वर्क का टाइम, सिंगल फैमिली (एकल परिवार) के चलन ने माता-पिता और बच्चों के बीच एक भावनात्मक दूरी पैदा कर दी हैं। किसी भी रिश्ते की मजबूती के लिए वक्त देना बेहद जरूरी होता है और जब बात पेरेंट्स और बच्चों की हो तो ये और भी अहम हो जाता है।
बदल रही है रिश्ते की बुनियाद
भारत सरकार के ‘टाइम यूज सर्वे’ के अनुसार महानगरों में कामकाजी माता-पिता वर्किंग डेज में अपने बच्चों के साथ औसतन केवल 30 मिनट से 2 घंटे ही बिता पाते हैं। बच्चों को समय न दे पाने के कारण लगभग 34 प्रतिशत कामकाजी महिलाओं को अपने करियर में बड़ा ब्रेक लेना पड़ता है या नौकरी छोड़नी पड़ती है। लगभग 50 प्रतिशत से ज्यादा वर्किंग मदर्स लगातार इस अपराधबोध में जीती हैं कि वे बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पा रही हैं। राहत की बात यह है कि जॉब पोर्टल इंडीड के सर्वे के अनुसार 78% भारतीय कामकाजी लोगों ने माना कि वे ज्यादा पैकेज के बजाय ऐसी नौकरियों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ बेहतर हो और वे परिवार को समय दे सकें
उम्र के हिसाब से बच्चों का रखें विशेष ध्यान
शुरुआती बचपन (0 से 5 वर्ष) में बच्चों को ‘सिक्योर अटैचमेंट’ (सुरक्षा की भावना) चाहिए होती है। माता-पिता के अचानक दूर जाने से वे ‘सेपरेशन एंग्जायटी’ (बिछड़ने का डर) का शिकार हो जाते हैं जिससे वे अधिक चिड़चिड़े या रोने वाले बन सकते हैं। स्कूली उम्र (6 से 12 वर्ष) में बच्चे माता-पिता का अटेंशन चाहते हैं। समय न मिलने पर वे जिद्दी हो जाते हैं और मोबाइल एवं टीवी के आदी हो सकते हैं जिस वजह से उनका ध्यान पढ़ाई से भटक सकता है। टीनएजर्स को प्राइवेसी पसंद होती है लेकिन वे अंदरूनी तौर पर मार्गदर्शन की तलाश में होते हैं। संवाद की कमी के कारण वे अकेलेपन या गलत संगति का शिकार हो सकते हैं।

कॉरपोरेट जगत में हो रहे सकारात्मक बदलाव
इस संकट को देखते हुए कुछ भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर और कंपनियों ने कामकाजी माता-पिता को राहत देने के लिए कुछ नीतियां अपनाई हैं जैसे हफ्ते में 2 से 3 दिन घर से काम करने की आजादी ने माता-पिता को बच्चों के स्कूल टाइमिंग के साथ तालमेल बिठाने में मदद की है। कई बड़ी कंपनियों ने अपने ऑफिस परिसर में ही डेकेयर की सुविधा दी है ताकि पेरेंट्स लंच ब्रेक में बच्चों से मिल सकें। अब पिताओं को भी पेरेंटल लीव मिल रही है जिससे बच्चों की परवरिश का बोझ अब केवल मां पर नहीं पड़ेगा।
इन चीजों को अपनाएं, रिश्ते होंगे मजबूत
वर्किंग पेरेंट्स के लिए समय की कमी एक वास्तविकता है लेकिन कुछ चीजों को अपनाने से बच्चों के संग उनके रिश्तों को मजबूत किया जा सकता है। जैसे ऑफिस से घर लौटने के बाद पहले 45 मिनट मोबाइल और लैपटॉप को पूरी तरह बंद कर दें। यह समय सिर्फ बच्चे से बात करने या खेलने के लिए रखें। रात को सोते समय बच्चों को कहानी सुनाना या उनके पूरे दिन का हाल (जैसे आज स्कूल में सबसे अच्छी बात क्या हुई?) पूछना, उनके मानसिक तनाव को पूरी तरह खत्म कर देता है। कपड़े समेटना, पौधों में पानी देना या वीकेंड पर बेकिंग करना, इन छोटे-छोटे कामों में बच्चों को शामिल करें। इससे रिश्ते मजबूत होंगे।
बच्चों से खुलकर संवाद जरूर करें
बच्चों से अपनी व्यस्तता और काम के महत्व पर खुलकर बात करें। जब बच्चे समझते हैं कि उनके माता-पिता उनके भविष्य के लिए मेहनत कर रहे हैं तो उनमें शिकायत की जगह सम्मान की भावना पैदा होती है। कामकाजी माता-पिता होना कोई गुनाह नहीं है। शोध बताते हैं कि कामकाजी पेरेंट्स के बच्चे अक्सर अधिक आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बनते हैं। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि जितने भी पल बच्चों के साथ बिताए जाएं वे बिना किसी मानसिक भटकाव के पूरी तरह स्नेह और ध्यान से भरपूर हों।






