Chhattisgarh

‘पंडवानी’ की आवाज थमी, दुनिया को लोककला से जोड़ने वाली तीजन बाई नहीं रहीं

पांच दशक से ज्यादा समय तक महाभारत की लोकगाथा को देश-दुनिया तक पहुंचाया, पुरुष वर्चस्व वाली कापालिक शैली में बनाई अलग पहचान, पद्म श्री से पद्म विभूषण तक कई बड़े सम्मान मिले, मोदी व योगी ने जताया शोक

न्यूज डेस्क, 5 जुलाई 2026:

छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाने वाली पद्म विभूषण से सम्मानित पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर एम्स में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थीं और पिछले कई हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थीं। उनके निधन के साथ भारतीय लोक कला जगत ने अपनी सबसे बुलंद आवाजों में से एक को खो दिया।

एम्स के अधिकारियों के मुताबिक रविवार तड़के करीब 3:15 बजे उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई, जिसके बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही छत्तीसगढ़ समेत देशभर के कलाकारों, साहित्यकारों और संस्कृति से जुड़े लोगों में शोक फैल गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर शोक जताते हुए कहा कि तीजन बाई ने अपनी अनोखी प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की पंडवानी को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाई। उन्होंने इसे कला और संस्कृति की अपूरणीय क्षति बताते हुए परिजनों और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की। वहीं सीएम योगी ने कहा कि उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा, सशक्त अभिव्यक्ति और संगीत साधना के माध्यम से छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परंपरा ‘पंडवानी’ को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। भारतीय लोक कला एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

पंडवानी को गांव से उठाकर दुनिया के मंच तक पहुंचाया

दुर्ग जिले के गनियारी गांव में 1956 में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद कठिन हालात में अपना सफर शुरू किया। उन्होंने उस समय पंडवानी की कापालिक शैली अपनाई, जब इस शैली पर लगभग पूरी तरह पुरुष कलाकारों का दबदबा था। सामाजिक विरोध, तानों और कई तरह की रुकावटों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

हाथ में तंबूरा, दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली प्रस्तुति ने उन्हें देश की सबसे अलग लोक कलाकारों में शामिल कर दिया। उनकी शैली ने पंडवानी को सिर्फ एक लोक गायन परंपरा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

विदेशों में भी गूंजी छत्तीसगढ़ की लोककला

करीब पांच दशक लंबे करियर में तीजन बाई ने एशिया, यूरोप समेत दुनिया के कई देशों में प्रस्तुति दी। उन्होंने पंडवानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी वजह से छत्तीसगढ़ की यह पारंपरिक लोककला वैश्विक पहचान हासिल कर सकी और कई युवा कलाकारों को इस विधा से जुड़ने की प्रेरणा मिली।

देश के सर्वोच्च सम्मानों से हुईं सम्मानित

लोक संस्कृति में असाधारण योगदान के लिए तीजन बाई को पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार समेत कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उनकी कला ने भारतीय लोक परंपरा को नई पहचान दिलाई और पंडवानी को विश्व स्तर पर स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

क्या है पंडवानी

पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक गायन शैली है, जिसमें महाभारत की कथा संगीत, अभिनय और संवाद के जरिए सुनाई जाती है। एक कलाकार मंच पर कई पात्रों को अपनी आवाज और अभिनय से जीवंत करता है। इस लोक परंपरा को देश-विदेश तक पहुंचाने में तीजन बाई का योगदान सबसे अहम माना जाता है।

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