
न्यूज डेस्क, 9 अगस्त 2026:
भारत की शराब इंडस्ट्री इन दिनों कई सालों के सबसे बड़े नियामकीय विवाद से गुजर रही है। पहली नजर में यह मामला कुछ लोकप्रिय शराब ब्रांड्स पर कार्रवाई का लग सकता है, लेकिन इसकी जड़ में एक ऐसा तकनीकी सवाल है जो सीधे करोड़ों उपभोक्ताओं, हजारों कारोबारियों और पूरे Indian Made Foreign Liquor यानी IMFL सेक्टर को प्रभावित कर सकता है।
स्वाद प्राकृतिक प्रक्रिया से आए फ्लेवर मिलाकर नहीं
विवाद इस बात का नहीं है कि शराब में फ्लेवर मिलाया गया या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या रम में रम जैसा फ्लेवर और व्हिस्की में व्हिस्की जैसा फ्लेवर मिलाकर उसे सामान्य रम या व्हिस्की के नाम से बेचा जा सकता है? FSSAI का कहना है कि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है क्योंकि रम और व्हिस्की का असली स्वाद प्राकृतिक प्रक्रिया से आना चाहिए, बाहर से मिलाए गए उसी तरह के फ्लेवर से नहीं।
कोर्ट पहुंच गईं हैं कंपनियां
यही वजह है कि McDowell’s No.1, Old Monk, Royal Challenge, Antiquity Blue, Bagpiper समेत कई चर्चित ब्रांड्स नियामकीय कार्रवाई के दायरे में आ गए हैं। दूसरी तरफ कंपनियों का कहना है कि वे दशकों से यही प्रक्रिया अपनाती रही हैं और अचानक इसे गैरकानूनी बताना उचित नहीं है। इसी विवाद ने अब अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
आखिर FSSAI की आपत्ति क्या है?
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा फ्लेवर शब्द को लेकर हो रही है। लेकिन FSSAI ने साफ किया है कि वह हर तरह की फ्लेवरिंग का विरोध नहीं कर रहा।
अगर कोई कंपनी Vanilla Flavoured Rum, Coffee Flavoured Whisky या किसी दूसरे अलग स्वाद वाला उत्पाद बेचती है और लेबल पर साफ-साफ यह जानकारी लिखती है, तो उस पर कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति वहां है जहां रम के अंदर रम जैसा ही फ्लेवर या व्हिस्की के अंदर व्हिस्की जैसा ही फ्लेवर मिलाया जाए, जबकि उपभोक्ता को बताया जाए कि यह स्वाद पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से तैयार हुआ है।
स्पष्ट पहचान के साथ होनी चाहिए बिक्री
यानी विवाद का सबसे अहम बिंदु यही है कि शराब का स्वाद डिस्टिलेशन और कई साल की मैच्योरेशन प्रक्रिया से आया या फिर बाद में उसी स्वाद का फ्लेवर मिलाकर तैयार किया गया। FSSAI का मानना है कि अगर किसी उत्पाद में बाहर से ऐसा फ्लेवर मिलाया गया है जो उसी शराब के प्राकृतिक स्वाद की नकल करता है, तो उसे केवल रम या व्हिस्की नहीं कहा जा सकता। ऐसे उत्पाद को Rum Flavoured Spirit या Whisky Flavoured Spirit जैसी स्पष्ट पहचान के साथ बेचा जाना चाहिए ताकि उपभोक्ता भ्रमित न हो।
प्राकृतिक स्वाद और फ्लेवर में क्या फर्क है?
यही इस पूरे विवाद की असली कहानी है।
रम, व्हिस्की, ब्रांडी जैसी शराब तैयार होने के बाद कई महीनों या कई वर्षों तक लकड़ी के पीपों में रखी जाती है। इस प्रक्रिया को Maturation या Ageing कहा जाता है। इसी दौरान शराब में धीरे-धीरे लकड़ी, तापमान, ऑक्सीजन और समय के असर से उसका असली स्वाद और खुशबू विकसित होती है। यही किसी अच्छी व्हिस्की या रम की पहचान मानी जाती है। लेकिन यदि यही स्वाद बाद में अलग फ्लेवरिंग कंपाउंड मिलाकर तैयार किया जाए तो उत्पाद का स्वाद तो मिलता-जुलता हो सकता है, मगर उसका स्रोत प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं माना जाएगा।
उपभोक्ता को सही जानकारी न देने का आरोप
FSSAI का कहना है कि उपभोक्ता जब रम खरीदता है तो उसकी यह अपेक्षा होती है कि उसे मिलने वाला स्वाद प्राकृतिक मैच्योरेशन से आया है, न कि उसी स्वाद की कृत्रिम या Nature Identical Flavouring से तैयार किया गया है। यही कारण है कि नियामक इसे केवल लेबलिंग का नहीं बल्कि उपभोक्ता को सही जानकारी देने का मामला मान रहा है।
किन कंपनियों पर हुई कार्रवाई?
FSSAI ने अलग-अलग निरीक्षण और जांच के बाद कई कंपनियों की यूनिट्स के खिलाफ कार्रवाई की।
इनमें यूनाइटेड स्पिरिट्स की बारामती यूनिट में बनने वाली McDowell’s No.1 Celebration Matured Rum, मध्य प्रदेश यूनिट में तैयार Antiquity Blue और Royal Challenge Whisky, मोहन मीकिन समूह की खोपोली यूनिट में बनने वाली Old Monk के तीन वैरिएंट, Inbrew Beverages की Bagpiper Deluxe Whisky और Old Cask XXX Rum तथा Associated Alcohols & Breweries के कुछ उत्पाद शामिल हैं।
देश के नामी ब्रांडों को दी गई नोटिस में बताईं खामियां
यानी मामला किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि देश के कई बड़े ब्रांड इसकी जद में आ चुके हैं।
नोटिस से लेकर प्रतिबंध तक कैसे पहुंचा मामला?
FSSAI ने जुलाई की शुरुआत में कई शराब कंपनियों को नोटिस भेजे। इनमें मुख्य रूप से तीन बातें उठाई गईं। पहली, प्राकृतिक स्वाद की जगह उसी स्वाद वाले फ्लेवर के इस्तेमाल का आरोप। दूसरी, शराब की उम्र यानी Ageing से जुड़े दावों पर सवाल। तीसरी, ब्लेंडेड स्पिरिट में वास्तविक उम्र का सही खुलासा नहीं करना। इसके बाद कंपनियों के साथ बैठक भी हुई लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ। बाद में अलग-अलग यूनिट्स पर उत्पादन और बिक्री से जुड़े प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिए गए।
कंपनियों ने कोर्ट में कहा- प्रक्रिया को नियमों के खिलाफ बताता अनुचित
सबसे पहले यूनाइटेड स्पिरिट्स ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी का कहना है कि वह पिछले करीब 50 वर्षों से इसी प्रक्रिया के तहत उत्पाद तैयार कर रही है। उद्योग में यह स्थापित प्रथा रही है और अचानक इसे नियमों के खिलाफ बताना उचित नहीं है। कंपनी का यह भी कहना है कि अगर उत्पाद पर नया लेबल लगाने की शर्त रखी जाती है तो पहले राज्य आबकारी विभाग से नई मंजूरी लेनी पड़ेगी। यह प्रक्रिया लंबी है और रातोंरात पूरी नहीं हो सकती।

यूनाइटेड स्पिरिट्स ने यह भी दलील दी कि FSSAI ने पहले उद्योग के साथ चर्चा की लेकिन उसके बाद कोई स्पष्ट संशोधन या नई अधिसूचना जारी नहीं की। ऐसे में पुराने नियमों की अलग व्याख्या करके उत्पादन रोक देना मनमाना फैसला माना जाना चाहिए। Old Monk बनाने वाली मोहन मीकिन ने भी लगभग इसी आधार पर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। वहीं Associated Alcohols & Breweries ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अलग चुनौती दी है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि यह मामला केवल एक कंपनी का नहीं बल्कि पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह खुद तकनीकी विशेषज्ञ नहीं है। इसलिए FSSAI का पक्ष सुने बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। अदालत ने केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को जवाब दाखिल करने को कहा और अगली सुनवाई 10 अगस्त तय की। फिलहाल नई खेप के उत्पादन और बिक्री पर रोक से जुड़ी स्थिति बनी हुई है।
दुनिया के सबसे बड़े शराब बाजार में है मजबूत हिस्सेदारी
भारत का IMFL बाजार दुनिया के सबसे बड़े शराब बाजारों में शामिल है। उद्योग से जुड़े पक्षों का दावा है कि इस कार्रवाई का असर पूरे सेक्टर के करीब 30 प्रतिशत हिस्से पर पड़ सकता है। इसका मतलब केवल बड़ी कंपनियां ही नहीं बल्कि हजारों डिस्ट्रीब्यूटर, थोक विक्रेता, रिटेलर, होटल, बार और राज्य सरकारों के आबकारी राजस्व पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से CIABC और ISWAI जैसे उद्योग संगठन भी इस मुद्दे पर FSSAI के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं।
निवेशकों को कंपनियों ने दिया भरोसा
यूनाइटेड स्पिरिट्स ने स्टॉक एक्सचेंज को भेजी जानकारी में कहा है कि उसे फिलहाल इस कार्रवाई से किसी बड़े वित्तीय नुकसान की आशंका नहीं है।
कंपनी ने अपने हालिया तिमाही नतीजों में मजबूत मुनाफा भी दर्ज किया है। इसके बावजूद निवेशकों की नजर अब अदालत की अगली सुनवाई पर है क्योंकि आने वाला फैसला पूरे उद्योग के लिए भविष्य की दिशा तय कर सकता है।
हाईकोर्ट में सुनवाई पर टिकी सबकी नजर
अब पूरे मामले की नजर 10 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई पर है। अदालत यह तय करेगी कि कंपनियों को नई खेप के उत्पादन और बिक्री में अंतरिम राहत मिलेगी या नहीं। इस मामले का असर सिर्फ McDowell’s, Old Monk, Royal Challenge या Antiquity Blue तक सीमित नहीं है। अदालत की व्याख्या यह भी तय करेगी कि भविष्य में भारत में रम, व्हिस्की जैसी शराब के प्राकृतिक स्वाद, फ्लेवरिंग, लेबलिंग और उपभोक्ता को दी जाने वाली जानकारी के मानक किस तरह लागू होंगे। यही वजह है कि यह विवाद केवल कुछ ब्रांड्स पर कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है, बल्कि भारतीय शराब उद्योग के नियमन, उपभोक्ता अधिकारों और उत्पाद की वास्तविक पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी और कारोबारी मुद्दा बन चुका है।






