
लखनऊ, 9 अगस्त 2026:
घर-परिवार और खेती-किसानी के दायरों तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाओं के इरादे बुलंद हों तो जीवन में बदलाव की बयार आते देर नहीं लगती। यूपी के कानपुर देहात जिले में अकबरपुर क्षेत्र की 32 वर्षीया श्वेता इसका जीवंत उदाहरण बनकर उभरी हैं। कभी केवल घरेलू कामकाज तक सीमित रहने वाली श्वेता आज आसपास के दर्जनों गांवों के पशुपालकों के लिए सबसे भरोसेमंद नाम बन चुकी हैं।
राज्य सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ‘पशु सखी’ के रूप में अपनी नई पहचान बनाने वाली श्वेता ने महज एक वर्ष के भीतर करीब 120 ग्रामीण परिवारों तक पहुंच बनाकर 300 से अधिक बकरियों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की हैं।
तीन दिन के प्रशिक्षण से खुली प्रगति की राह
पति, दो बच्चों और सास-ससुर के साथ रहने वाली श्वेता के पति तहसील में काम करते हैं। हालांकि, वक्त के साथ बढ़ती पारिवारिक जरूरतों और बच्चों के सुनहरे भविष्य की चिंता ने उन्हें आर्थिक रूप से योगदान देने की प्रेरणा दी। इसी दौरान ग्राम पंचायत की ‘समूह सखी’ के माध्यम से उन्हें पशु सखी योजना की जानकारी मिली। चयन के उपरांत आजीविका मिशन द्वारा दिए गए तीन दिनों के व्यावहारिक प्रशिक्षण ने उनकी सोच और कौशल को नया आयाम दिया। प्रशिक्षण पूरा होते ही श्वेता पूरे उत्साह के साथ गांव-गांव जाकर बकरी पालकों से संपर्क साधने में जुट गईं।
रोगों से बचाव और जागरूकता की नई अलख
श्वेता का काम केवल दवाएं बांटने तक सीमित नहीं है। वह पशुपालकों को बकरियों में फैलने वाले संक्रामक रोगों, समयबद्ध टीकाकरण, स्वच्छता और बेहतर देखभाल के प्रति लगातार जागरूक कर रही हैं। हाल ही में चलाए गए विशेष कृमिनाशन अभियान के दौरान उन्होंने लगभग 350 से 360 बकरियों को पेट के कीड़े मारने की दवा पिलाई। आज स्थिति यह है कि बकरी के अस्वस्थ होने या देखभाल से जुड़ी किसी भी समस्या पर ग्रामीण सबसे पहले श्वेता से ही परामर्श लेते हैं।

’बहू’ से ‘भरोसेमंद सलाहकार’ तक का अनुकरणीय सफर
शुरुआती दिनों में दूर-दराज के गांवों तक पैदल जाना, झिझक मिटाना और लोगों को समझाना श्वेता के लिए एक बड़ी चुनौती था। हालांकि, उनकी निष्ठा और सतत मेहनत ने ग्रामीणों का दृष्टिकोण पूरी तरह बदल दिया। बीते एक साल में उन्होंने पशु सखी के रूप में लगभग 30 हजार रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की है। इस कमाई का उपयोग उन्होंने दवाओं के प्रबंधन के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्चों को पूरा करने में किया है।
’बहू’ की पारंपरिक पहचान से आगे बढ़कर एक ‘स्वावलंबी सलाहकार’ के रूप में स्थापित श्वेता आज अपने फैसले खुद लेने में सक्षम बनने के साथ ही बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने के अपने सपने को पूरा करते हुए गांव की दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रही हैं।






