
राजकिशोर तिवारी
हरिद्वार, 27 सितंबर 2026ः
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के 12वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) पहुंचे। राज्यपाल ने 2,938 छात्र-छात्राओं को विभिन्न उपाधियां दीं। उन्होंने 32 मेधावियों को गोल्ड मेडल दिए। मेडल पाकर छात्रों के चेहरे खिल उठे। समारोह में पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल समेत चार विशिष्ट व्यक्तियों को मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। इसके अलावा छह छात्रों को पीएचडी की उपाधि दी गई। राज्यपाल ने छात्रों को संस्कृत में संबोधित किया।
मेडल पाकर छात्रों के खिले चेहरे
समारोह में प्रो. राम कुमार शर्मा, डॉ. अनुसूया प्रसाद पंत और प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय को मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। शैक्षणिक सत्र 2024-25 के लिए अरुण कुमार, अभिषेक बधानी, केशव अवस्थी, भास्कर चंद्र नैनवाल, शिवप्रसाद, पुनीत कुमार, जितेंद्र उनियाल, कमल ओझा, गौरव जगूड़ी, स्वामी रमतानंद, मोहम्मद शोएब, वंश शर्मा, स्वप्निल यादव, अनुज कुमार, आफरीन बानो और गगनदीप गुरागांई को गोल्ड मेडल मिले। वहीं, सत्र 2025-26 के लिए आयुष मिश्रा, गिरीश भद्री, अशोक कुमार काफले, देवेश सती, संजीव कुमार शर्मा, बलबीर-सास्वत, आशीष भदौला, कुमारी रितिका, स्वामी सकृपा नंदा, आयशा, मोहम्मद रईस अहमद, राजकुमार कुश, खुशबू, नईम अहमद, सचिन पालीवाल और जगदीश चंद्र पांडे को स्वर्ण पदक मिले। इसके अलावा शैलेंद्र बहुगुणा, अभिषेक परगांई, अमित प्रकाश बंदोलिया, अरुण ममगांई, जसुदेव व आशुतोष काला को पीएचडी की उपाधि मिली।

संस्कृत को नवाचार से जोड़ने का किया आह्वान
राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत को केवल प्राचीन विरासत के रूप में सहेजना पर्याप्त नहीं, बल्कि इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग, डिजिटल तकनीक और आधुनिक भाषा-विज्ञान से जोड़कर भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना होगा। उन्होंने संस्कृत को तकनीक और नवाचार से जोड़ने का आह्वान किया। कहा कि संस्कृत को पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। इसे डिजिटल संसार, शोध प्रयोगशालाओं और वैश्विक ज्ञान-विमर्श तक ले जाने की जरूरत है। संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना और समृद्ध साहित्य में आधुनिक तकनीक के साथ शोध की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-चेतना, चिंतन परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति की प्रमुख वाहक है।
रोजगार के नए रास्ते खोलने पर जोर
गुरमीत सिंह ने कहा कि संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए अध्यापन के अलावा अनुवाद, शोध, भारतीय दर्शन, संस्कृति, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया और भाषा-तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी अवसर हैं। संस्कृत को रोजगार, शोध, तकनीक और नवाचार से जोड़ना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल शिक्षा पूरी होने का पड़ाव नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति नई जिम्मेदारियों की शुरुआत है। उन्होंने विद्यार्थियों से ज्ञान को निरंतर बढ़ाने, संस्कारों को जीवन में उतारने, समाजसेवा करने, नवाचार अपनाने और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने के पांच संकल्प लेने का आह्वान किया।
10 हजार दुर्लभ पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं मिलीं
राज्यपाल ने पद्मश्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र की ओर से विश्वविद्यालय को करीब 10 हजार दुर्लभ पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं के दान के लिए आभार जताया। उन्होंने कहा कि इन पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं को ‘अभिराज-पुस्तक-वीथी’ के रूप में संरक्षित किया जाना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा साबित होगा। समारोह में कैबिनेट मंत्री डॉ. धन सिंह रावत, प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय गुवाहाटी के कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पाण्डेय सहित शिक्षक, परिषदों के सदस्य और छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।






