Uttar Pradesh

विश्व जल दिवस पर विशेष : सूखे इलाके से जल संतुलन तक का सफर पूरा…जालौन बना मिसाल

नून नदी के पुनर्जीवन और जनभागीदारी से बदली तस्वीर, राष्ट्रीय जल पुरस्कार में तीसरा स्थान, गांव-गांव तक पहुंचा जल बचाओ अभियान तालाब, चेकडैम, हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर से बढ़ा भूजल, दोहन पर भी लगा नियंत्रण

जालौन, 22 मार्च 2026:

बुंदेलखंड का नाम आते ही कभी पानी की किल्लत सबसे पहले याद आती थी, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। जालौन ने जल संरक्षण के मामले में ऐसा काम किया है, जिसकी चर्चा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश स्तर पर हो रही है। योजनाबद्ध तरीके से किए गए प्रयास, लोगों की भागीदारी और पारंपरिक जल स्रोतों को फिर से जिंदा करने की कोशिशों ने इस बदलाव को जमीन पर उतारा है।

विश्व जल दिवस के मौके पर जालौन का उदाहरण इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि यहां पानी की समस्या से जूझने वाला इलाका अब संतुलित भूजल की दिशा में आगे बढ़ रहा है। हाल ही में हुए राष्ट्रीय जल पुरस्कार कार्यक्रम में जिले को जल संरक्षण की श्रेणी में तीसरा स्थान मिला है। यह उपलब्धि बताती है कि यहां किए गए काम सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनका असर साफ नजर आ रहा है।

जिले में जल संरक्षण को लेकर काम किसी एक योजना तक सीमित नहीं रखा गया। अलग-अलग स्तर पर एक साथ कई पहल की गईं। गांवों में तालाब बनाए गए, पुराने तालाबों को फिर से तैयार किया गया, चेकडैम बनाए गए और बारिश के पानी को बचाने के लिए रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग को बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही सोकपिट और जलतारा जैसे छोटे-छोटे उपाय भी बड़े असर वाले साबित हुए।

World Water Day Jalaun's Conservation Efforts (1)

जालौन में इस समय हजारों की संख्या में जल संरचनाएं काम कर रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक जिले में 7 हजार से ज्यादा जल संरचनाएं मौजूद हैं, जिनमें सैकड़ों नए तालाब और सैकड़ों रूफटॉप हार्वेस्टिंग सिस्टम शामिल हैं। इनका सीधा फायदा यह हुआ कि बारिश का पानी अब बहकर बेकार नहीं जा रहा, बल्कि जमीन के अंदर पहुंचकर भूजल को मजबूत कर रहा है।

जल संरक्षण की इस मुहिम में लोगों को जोड़ने पर भी खास जोर दिया गया। सिर्फ सरकारी स्तर पर काम करने के बजाय गांव-गांव तक जागरूकता पहुंचाई गई। इसके लिए वाटर समिट जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। स्कूलों में बच्चों को जल बचाने के बारे में बताया गया और गांवों में शिविर लगाए गए।

इन अभियानों के दौरान लाखों लोगों को जल संरक्षण की शपथ दिलाई गई। छात्र, किसान और आम ग्रामीण इस मुहिम का हिस्सा बने। पोस्टर प्रतियोगिता, नुक्कड़ नाटक और बैठकों के जरिए लोगों को समझाया गया कि पानी बचाना क्यों जरूरी है और इसे कैसे बचाया जा सकता है। इसका असर यह हुआ कि लोग खुद आगे आकर इन कामों में शामिल होने लगे।

जालौन में नदियों को लेकर भी बड़ा काम किया गया। एक जिला एक नदी पहल के तहत नून नदी को फिर से जिंदा करने का अभियान चलाया गया। यह नदी अपने उद्गम के कुछ किलोमीटर बाद ही अपना स्वरूप खो चुकी थी। कई जगहों पर अतिक्रमण हो गया था और पानी का बहाव लगभग खत्म हो गया था।

नदी को फिर से जीवित करने के लिए पहले उसके रास्ते से अतिक्रमण हटाया गया। नदी में मिलने वाले प्रमुख नालों को साफ किया गया, जिससे पानी का प्रवाह फिर से शुरू हो सके। इसके बाद नदी की तलहटी की खुदाई कराई गई और उसे चौड़ा किया गया, ताकि वह अपने पुराने रूप में लौट सके।

इस पूरे काम में स्थानीय लोगों की भूमिका अहम रही। गांव के लोग खुद आगे आए और नदी को बचाने के अभियान में हिस्सा लिया। नदी के किनारों पर बड़ी संख्या में पौधे लगाए गए, जिससे मिट्टी का कटाव रुके और हरियाली भी बढ़े। धीरे-धीरे नदी में पानी का बहाव फिर से दिखाई देने लगा।

भूजल के स्तर पर भी इसका असर साफ नजर आया है। जिले में भूजल दोहन को संतुलित करने पर खास ध्यान दिया गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जिले में जितना पानी इस्तेमाल हो रहा है, वह सुरक्षित सीमा के अंदर है। इससे यह संकेत मिलता है कि पानी का उपयोग सोच-समझकर किया जा रहा है।

जिले के सभी ब्लॉकों की स्थिति भी संतुलित मानी जा रही है। कहीं भी ऐसा नहीं है कि पानी का जरूरत से ज्यादा दोहन हो रहा हो। कुछ ब्लॉकों में उपयोग का प्रतिशत ज्यादा जरूर है, लेकिन वह भी तय सीमा के भीतर है। इससे आने वाले समय में पानी की उपलब्धता बनी रहने की उम्मीद है। जालौन में भूजल रिचार्ज की क्षमता भी काफी ज्यादा बताई जा रही है। जिले का बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां पानी को जमीन में पहुंचाने की अच्छी संभावना है। यही वजह है कि यहां जल संरक्षण के उपायों का असर जल्दी दिखाई दिया है।

खेती पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ा है। पहले जहां किसानों को पानी के लिए दिक्कत होती थी, वहीं अब सिंचाई की स्थिति बेहतर हुई है। तालाब और अन्य जल संरचनाओं के चलते खेतों तक पानी पहुंचना आसान हुआ है। इससे फसलों की पैदावार पर भी असर पड़ा है।

गांवों में पानी की उपलब्धता बढ़ने से रोजमर्रा की जिंदगी भी आसान हुई है। हैंडपंप और नलकूपों में पानी का स्तर बेहतर हुआ है। लोगों को दूर से पानी लाने की जरूरत पहले की तुलना में कम हुई है। इससे समय और मेहनत दोनों की बचत हो रही है। जालौन का भूगोल भी जल संरक्षण के लिए अनुकूल माना जाता है। यहां की जमीन पानी को सोखने में सक्षम है, जिससे भूजल को रिचार्ज करना आसान होता है। इसी का फायदा उठाते हुए यहां बड़े स्तर पर जल संरक्षण के काम किए गए हैं।

जिले में पानी के प्रमुख स्रोतों में भूजल के साथ-साथ नदियां, तालाब और नहरें शामिल हैं। बारिश का पानी भी यहां एक अहम भूमिका निभाता है। इन सभी स्रोतों को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई गईं, जिससे पानी की उपलब्धता को संतुलित रखा जा सके।

इस पूरे अभियान में सबसे खास बात यह रही कि इसे सिर्फ सरकारी काम नहीं रहने दिया गया। आम लोगों को इसमें भागीदार बनाया गया। गांवों में लोगों ने खुद तालाबों की सफाई की, जल संरचनाओं की देखभाल की और पानी बचाने के तरीकों को अपनाया।

जिले में जल संरक्षण को मजबूत करने के लिए स्कूलों और कॉलेजों में भी लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। नई पीढ़ी को शुरू से ही पानी की अहमियत समझाई जा रही है, ताकि आने वाले समय में भी यह प्रयास जारी रह सके। बच्चों के जरिए परिवारों तक यह संदेश तेजी से पहुंच रहा है। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में महिलाएं भी इस अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जल संरक्षण से जुड़े कई कामों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वे न सिर्फ घरों में पानी बचाने के तरीके अपना रही हैं, बल्कि गांव स्तर पर भी लोगों को जागरूक कर रही हैं।

अब जालौन का यह मॉडल दूसरे जिलों के लिए भी उदाहरण बनता जा रहा है। जिस इलाके को कभी पानी की कमी के लिए जाना जाता था, वही अब जल संरक्षण के कामों के लिए पहचान बना रहा है। जिले में जल संरचनाओं के रखरखाव पर भी लगातार ध्यान दिया जा रहा है, ताकि बनाए गए संसाधन लंबे समय तक काम करते रहें। इसके लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी की व्यवस्था की गई है और लोगों को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया है, लेकिन इसका असर लंबे समय तक रहने वाला माना जा रहा है।

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