लखनऊ, 23 मार्च 2026:
यूपी की राजधानी लखनऊ के सदर क्षेत्र का ऐतिहासिक बड़ा शिवाला श्री सिद्धनाथ मंदिर अब एक नए रूप में नजर आने वाला है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा इस प्राचीन धार्मिक स्थल के कायाकल्प का कार्य तेजी से अंतिम चरण में पहुंच चुका है। करीब एक करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इस परियोजना का लगभग 75 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। जल्द ही यह स्थल श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनेगा।
लखौरी ईंटों, सुर्खी और चूने से निर्मित यह मंदिर अपनी विशिष्ट स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है। अष्टभुजाकार मंडप पर स्थापित मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान बाबा सिद्धनाथ भक्तों की गहरी आस्था के केंद्र हैं। मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व इसे राजधानी की महत्वपूर्ण आध्यात्मिक धरोहरों में विशेष स्थान दिलाता है।

परियोजना के तहत श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यात्री हॉल और यात्री निवास का निर्माण पूरा कर लिया गया है। इससे बाहर से आने वाले भक्तों को ठहरने और धार्मिक आयोजनों में भाग लेने में आसानी होगी। मंदिर तक पहुंचने वाले मार्ग पर इंटरलॉकिंग का कार्य भी पूरा हो चुका है। इससे आवागमन सुगम और सुरक्षित हो गया है। पुरुष एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग शौचालयों का निर्माण भी अंतिम चरण में है।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि सीएम योगी के नेतृत्व में प्रदेश सरकार ‘आस्था से अर्थ’ के मॉडल पर कार्य कर रही है। इसके तहत अल्पज्ञात पौराणिक स्थलों को विकसित कर उन्हें पर्यटन मानचित्र पर स्थापित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस तरह के विकास कार्य न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करते हैं बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहन और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती भी प्रदान करते हैं।

मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आकर्षक लाइटिंग व्यवस्था से रात्रि में मंदिर की भव्यता और अधिक निखरेगी। इसके साथ ही हरित क्षेत्र के विकास, पौधरोपण और लैंडस्केपिंग का कार्य भी किया जाएगा। श्रद्धालुओं के लिए बैठने की व्यवस्था, स्वच्छता प्रबंधन, पेयजल सुविधा और सूचना पट्ट भी लगाए जा रहे हैं। परिसर को व्यवस्थित और आकर्षक बनाने के लिए सौंदर्यपरक दीवारों और भव्य प्रवेश द्वार का निर्माण भी कराया जा रहा है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थल भगवान श्रीराम के काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान लक्ष्मण जी ने यहां भगवान शिव की पूजा की थी। यही कारण है कि इस मंदिर में विराजमान स्वयंभू शिवलिंग को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि लगातार 40 दिनों तक श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां भव्य धार्मिक आयोजन, भजन-कीर्तन और मेलों का आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। मंदिर का यह कायाकल्प न केवल आस्था को नया आयाम देगा, बल्कि लखनऊ की धार्मिक पर्यटन पहचान को भी सशक्त बनाएगा।






