Uttar Pradesh

छोटे जिलों के अस्पताल अब संभाल रहे क्रिटिकल केस… प्रसव व अन्य मामलों के रेफरल में आई कमी

चार साल में 76 जिला अस्पतालों के 1791 डॉक्टरों को मिला प्रशिक्षण, आरआरटीसी मॉडल से जिलों में मातृ और नवजात सेवाएं हुईं मजबूत

लखनऊ, 26 मार्च 2026:

उत्तर प्रदेश में छोटे जिलों के अस्पताल अब केवल सामान्य इलाज तक सीमित नहीं रहे। जटिल प्रसव के मामलों में भी अब मरीजों को बड़े शहरों की ओर भेजने की जरूरत कम पड़ रही है। राज्य सरकार के प्रयासों से जिला स्तर पर ही इलाज की सुविधा मजबूत हुई है। पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य ढांचे को बेहतर बनाने के साथ डॉक्टरों और स्टाफ की ट्रेनिंग पर खास जोर दिया गया। इसी का असर है कि चार साल में 76 जिला अस्पतालों के 1791 डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया गया।

आरआरटीसी मॉडल से बदली तस्वीर

मातृ और नवजात मृत्यु दर कम करना लंबे समय से चुनौती रही है। जिला और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ सेवाओं की कमी, आपात स्थिति में फैसले लेने में देरी और रेफरल की जटिल प्रक्रिया से कई बार हालात बिगड़ते थे। इन समस्याओं से निपटने के लिए रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर यानी आरआरटीसी मॉडल लागू किया गया। इस समय प्रदेश में 20 मेडिकल कॉलेज इस मॉडल पर काम कर रहे हैं। इसमें मेडिकल कॉलेज को नॉलेज हब बनाया गया है, जबकि जिला अस्पताल उनसे जुड़े रहते हैं और लगातार मार्गदर्शन लेते हैं। इस मॉडल के तहत ऑन-साइट ट्रेनिंग, स्टाफ की क्षमता बढ़ाने और अलग-अलग विभागों के तालमेल पर काम किया गया।

अलीगढ़ मॉडल से जिलों को मिला सहारा

अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में बना आरआरटीसी इस दिशा में एक उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां से अलीगढ़, हाथरस और कासगंज के डॉक्टरों और स्टाफ को ट्रेनिंग दी गई। इसका असर यह हुआ कि अब ये अस्पताल जटिल मामलों को भी संभालने लगे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अब केवल ट्रेनिंग ही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को मजबूत करने पर काम हो रहा है, जिससे हर अस्पताल आत्मविश्वास के साथ गंभीर मामलों को संभाल सके।

कासगंज में दिखा जमीनी बदलाव

कासगंज जिला महिला अस्पताल में इस बदलाव का असर साफ नजर आता है। 2017 में जहां पहला सी-सेक्शन एक बड़ी उपलब्धि माना गया था, वहीं अब ऑपरेशन थिएटर पूरी तरह सक्रिय है और स्टाफ प्रशिक्षित है। अब अधिकतर जटिल प्रसव का इलाज यहीं हो रहा है। पहले जिन मामलों को तुरंत रेफर करना पड़ता था, उनमें से कई अब जिले में ही संभाले जा रहे हैं। इससे समय की बचत हुई है और मरीजों को राहत मिली है।

कोविड के दौरान भी नहीं रुका काम, क्रिटिकल केस संभालने से बढ़ा भरोसा

कोविड-19 के समय जब स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव था, तब भी इस मॉडल का काम जारी रहा। ऑनलाइन ट्रेनिंग के जरिए डॉक्टरों और स्टाफ को लगातार अपडेट किया गया। इससे संस्थागत प्रसव और नवजात देखभाल की सेवाएं प्रभावित नहीं हुईं। जेएन मेडिकल कॉलेज की डॉ. नसरीन नूर एक मामले का जिक्र कर बताती हैं कि 23 साल की महिला पेट दर्द के साथ अस्पताल पहुंची। शुरुआती जांच में स्थिति सामान्य लगी, लेकिन आगे की जांच में जटिल प्रेग्नेंसी का पता चला। तुरंत ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई गई। बाद में उसी महिला ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया।

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