लखनऊ, 2 अप्रैल 2026:
साइबर अपराध के तेजी से बदलते तौर तरीकों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए योगी सरकार ने एक अहम पहल की है। यूपी की राजधानी लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में 500 से अधिक ‘साइबर फॉरेंसिक वॉरियर’ तैयार किए जा रहे हैं। ये विशेषज्ञ भविष्य में सीमापार हैकिंग, एआई जनित फिशिंग, डीपफेक, वॉइस क्लोनिंग और अन्य उभरते डिजिटल खतरों से मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
इसी दिशा में आयोजित ‘मीट माई मेंटोर’ कार्यक्रम में साइबर सुरक्षा और क्वांटम तकनीक के विशेषज्ञों ने साफ किया कि आने वाले समय में साइबर अपराध और अधिक जटिल और खतरनाक रूप ले सकता है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं भारत सरकार के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के सदस्य डॉ. अजय सिंह ने इसे विश्वस्तरीय बनने की दिशा में अग्रसर बताया।
डॉ. सिंह ने कहा कि साइबर खतरे अब पारंपरिक ईमेल और एसएमएस से आगे बढ़ चुके हैं। आज वॉइस क्लोनिंग, डीपफेक वीडियो और फर्जी वीडियो कॉल के माध्यम से बड़े पैमाने पर अपराध किए जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि नए प्रकार के मालवेयर अब स्वयं सीखने और विकसित होने में सक्षम हैं। इससे सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती और बढ़ गई है। साथ ही उन्होंने क्लाउड कंप्यूटिंग की सीमाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि एक डेटा ब्रीच कई संगठनों को एक साथ प्रभावित कर सकता है।
संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जीके गोस्वामी ने कहा कि क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी अत्याधुनिक तकनीकें भविष्य का आधार बनने जा रही हैं। ऐसे में युवाओं को अभी से इसके लिए तैयार करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि संस्थान को एक ‘वन-स्टॉप सेंटर’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें कानूनी, फॉरेंसिक और तकनीकी ज्ञान का समन्वय होगा।
डॉ. गोस्वामी ने छात्रों से कहा कि जटिल विषयों को समझने की सही पद्धति ही उन्हें सरल बनाती है।यही संस्थान का लक्ष्य है। उन्होंने विश्वास जताया कि यहां से प्रशिक्षित छात्र वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होंगे। कार्यक्रम में उप निदेशक जितेंद्र श्रीवास्तव, चिरंजीव मुखर्जी, अतुल यादव, पीआरओ संतोष तिवारी सहित संस्थान के कई फैकल्टी सदस्य और अन्य लोग उपस्थित रहे।






