Uttar Pradesh

गोबर से ‘जीन क्रांति’! UP में अब इस तकनीक बदलेगी खेती और गांवों की तस्वीर

गोमूत्र, माइक्रोबियल रिसर्च और जेनेटिक इंजीनियरिंग से बनेगी सुपर ऑर्गेनिक खाद, 15 गुना ज्यादा असरदार और 10 गुना तेजी से होगी तैयार, गोशालाएं बनेंगी रोजगार और कमाई का नया केंद्र

लखनऊ, 16 मई 2026:

यूपी में अब गोबर और गोमूत्र केवल पारंपरिक उपयोग तक सीमित नहीं रहेंगे अपितु ये संसाधन खेती में जीन क्रांति का आधार बनने जा रहे हैं। प्रदेश सरकार गो संरक्षण, वैज्ञानिक खेती और ग्रामीण रोजगार को जोड़ते हुए एक ऐसे मॉडल पर काम कर रही है जो देश में पहली बार लागू होने जा रहा है। इस पहल में गोबर, गोमूत्र और माइक्रोबियल रिसर्च आधारित जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक का उपयोग कर हाई क्वालिटी ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तैयार किया जाएगा।

इस नई तकनीक को आईआईटी कानपुर के पीएचडी शोधार्थी अक्षय श्रीवास्तव ने विकसित किया है। शोध के तहत जेनेटिक इंजीनियरिंग, एंजाइम एक्सट्रैक्शन, माइक्रोबियल आइसोलेशन और बायोपॉलिमर डेवलपमेंट को गो आधारित प्राकृतिक संसाधनों से जोड़ा गया है। दावा है कि इससे तैयार होने वाली ऑर्गेनिक खाद पारंपरिक जैविक खाद की तुलना में 15 गुना अधिक प्रभावशाली होगी। इसकी पोषण क्षमता लगभग पांच गुना ज्यादा होगी।

सबसे बड़ी बात यह है कि इसे तैयार करने में लगने वाला समय भी 10 गुना तक कम हो जाएगा। शोधकर्ताओं ने फसल आधारित विशेष माइक्रोबियल कॉन्सन्ट्रेट विकसित किया है। केवल एक किलोग्राम माइक्रोबियल कॉन्सन्ट्रेट से करीब 2000 किलोग्राम जैविक उर्वरक तैयार किया जा सकेगा। इससे किसानों की लागत में भारी कमी आएगी। खेतों में इस खाद की जरूरत भी मात्र 350 से 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई गई है, जो पारंपरिक जैविक खाद की तुलना में बेहद कम है।

इससे परिवहन, श्रम और भंडारण की लागत भी घटेगी। इस तकनीक को इंडियन काउन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च द्वारा 40 से अधिक गुणवत्ता और पोषण मानकों पर परीक्षण के बाद प्रमाणित भी किया जा चुका है। यह खाद मुख्य रूप से गोबर, गोमूत्र, कृषि अपशिष्ट और अन्य प्राकृतिक जैविक स्रोतों से तैयार की जा रही है। माइक्रोबियल प्रोसेसिंग और एंजाइम तकनीक के जरिए इसकी पोषक क्षमता कई गुना बढ़ाई गई है।

प्रदेश सरकार अब गोशालाओं को केवल पशु संरक्षण केंद्र नहीं बल्कि जैविक खाद उत्पादन, बायोगैस निर्माण और ग्रामीण आय के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी में है। बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाली स्लरी और वेस्ट बायोमास से मात्र 3 से 4 दिनों में हाई क्वालिटी कस्टमाइज्ड ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर तैयार किए जा रहे हैं।

इस परियोजना में महिला स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों और स्थानीय किसानों को भी जोड़ा जा रहा है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में गोबर संग्रहण और माइक्रोबियल प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जा रही हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर पैदा होंगे।

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता का कहना है कि यदि यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है तो उत्तर प्रदेश देश में गो आधारित वैज्ञानिक खेती और ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

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